अध्याय 12 · 13 / 16
12.16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
अनपेक्षः—उदासीन; शुचिः—शुद्ध; दक्षः—निपुण; उदासीनः—चिन्ता से रहित; गत-व्यथः—समस्त दुःख से मुक्त; सर्व-आरम्भ—समस्त प्रयासों का; परित्यागी—त्यागकर्ता; यः—जो कोई; मत्-भक्तः—मेरा भक्त; सः—वह; मे—मुझे; प्रियः—अत्यन्त प्रिय।
जो भक्त क्रियाओं के सामान्य क्रम पर आश्रित नहीं है, जो शुद्ध, निपुण, चिन्तारहित, समस्त वेदनाओं से मुक्त है, और जो किसी फल के लिए प्रयत्न नहीं करता, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
भक्त को धन अर्पित किया जा सकता है, किन्तु उसे इसे अर्जित करने हेतु संघर्ष नहीं करना चाहिए। यदि स्वतः ही, परमेश्वर की कृपा से, धन उसके पास आ जाता है, तो वह विचलित नहीं होता। स्वभावतः भक्त दिन में कम से कम दो बार स्नान करता है और भक्ति हेतु प्रातःकाल जल्दी उठता है। इस प्रकार वह स्वभावतः भीतर एवं बाहर दोनों रूप से शुद्ध रहता है। भक्त सदा निपुण होता है, क्योंकि वह जीवन की समस्त क्रियाओं का तात्पर्य भली-भाँति जानता है, और वह प्रामाणिक शास्त्रों के प्रति आश्वस्त है। भक्त कभी किसी विशेष पक्ष का अनुसरण नहीं करता; अतएव वह चिन्तारहित रहता है। वह कभी पीड़ित नहीं होता, क्योंकि वह समस्त उपाधियों से मुक्त है; वह जानता है कि उसका शरीर एक उपाधि है, अतः यदि कुछ शारीरिक वेदनाएँ हों, तो वह उनसे मुक्त रहता है। शुद्ध भक्त किसी ऐसी वस्तु के लिए प्रयत्न नहीं करता जो भक्ति के सिद्धान्तों के विरुद्ध हो। उदाहरणार्थ, किसी विशाल भवन का निर्माण करने में बहुत ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और भक्त ऐसे कार्य को नहीं अपनाता यदि उससे उसकी भक्ति में उन्नति का लाभ न हो। वह भगवान् के लिए मन्दिर का निर्माण कर सकता है, और उसके लिए वह सब प्रकार की चिन्ता उठा सकता है, किन्तु वह अपने व्यक्तिगत सम्बन्धियों के लिए विशाल भवन का निर्माण नहीं करता।