हि

अध्याय 12 · 14 / 16

12.17

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥

यः—जो; न—कभी नहीं; हृष्यति—हर्षित होता है; न—कभी नहीं; द्वेष्टि—द्वेष करता है; न—कभी नहीं; शोचति—शोक करता है; न—कभी नहीं; काङ्क्षति—इच्छा करता है; शुभ—शुभ; अशुभ—अशुभ; परित्यागी—त्यागकर्ता; भक्तिमान्—भक्त; यः—जो; सः—वह; मे—मुझे; प्रियः—प्रिय।

जो न तो हर्ष को ग्रहण करता है और न शोक को, जो न तो विलाप करता है और न इच्छा करता है, तथा जो शुभ एवं अशुभ दोनों ही वस्तुओं का त्याग कर देता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

शुद्ध भक्त भौतिक लाभ और हानि पर न तो प्रसन्न होता है और न दुःखी, न ही वह पुत्र अथवा शिष्य पाने के लिए अत्यधिक उत्सुक रहता है, और न उन्हें न पाने पर खिन्न होता है। यदि उसकी कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु छिन जाए, तो वह विलाप नहीं करता। इसी प्रकार, यदि उसे अपनी इच्छित वस्तु न मिले, तो भी वह दुःखी नहीं होता। समस्त प्रकार के शुभ, अशुभ एवं पापमय कर्मों के समक्ष वह दिव्य बना रहता है। परमेश्वर की प्रसन्नता हेतु वह सब प्रकार के जोखिम उठाने को उद्यत रहता है। उसकी भक्ति के निर्वाह में कोई बाधा नहीं आती। ऐसा भक्त श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय है।