अध्याय 12 · 15 / 16
12.18-19
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
समः—समान; शत्रौ—शत्रु के प्रति; च—भी; मित्रे—मित्रों के प्रति; च—भी; तथा—वैसे ही; मान—मान; अपमानयोः—अपमान; शीत—शीत; उष्ण—उष्णता; सुख—सुख; दुःखेषु—दुःख में; समः—समभाव; सङ्ग-विवर्जितः—समस्त संगति से मुक्त; तुल्य—समान; निन्दा—निन्दा; स्तुतिः—स्तुति; मौनी—मौन; सन्तुष्टः—सन्तुष्ट; येन—जिस; केन—किसी; चित्—भी प्रकार से; अनिकेतः—जिसका कोई निवास नहीं; स्थिर—स्थिर; मतिः—संकल्प; भक्तिमान्—भक्ति में संलग्न; मे—मुझे; प्रियः—प्रिय; नरः—मनुष्य।
जो मित्रों एवं शत्रुओं के प्रति समान है, जो मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुःख तथा यश-अपयश में समभाव रहता है, जो सदा संदूषण से मुक्त है, सदा मौन एवं किसी भी वस्तु से सन्तुष्ट रहता है, जो किसी निवास की चिन्ता नहीं करता, जो ज्ञान में स्थिर है तथा भक्ति में संलग्न है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
भक्त सदा समस्त कुसंगति से मुक्त रहता है। कभी मनुष्य की प्रशंसा होती है, तो कभी निन्दा; यही मानव-समाज का स्वभाव है। किन्तु भक्त कृत्रिम यश-अपयश तथा दुःख-सुख के प्रति सदा दिव्य रहता है। वह अत्यन्त धैर्यवान् होता है। वह श्रीकृष्ण के विषयों के अतिरिक्त किसी अन्य बात की चर्चा नहीं करता; अतः उसे मौनी कहा जाता है। मौन का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य बोले ही नहीं; मौन का अर्थ है कि मनुष्य निरर्थक बातें न करे। मनुष्य को केवल सारगर्भित विषयों पर ही बोलना चाहिए, और भक्त के लिए सर्वाधिक सारगर्भित वाणी परमेश्वर के विषय में बोलना है। वह सब अवस्थाओं में प्रसन्न रहता है; कभी उसे अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन मिल जाता है, तो कभी नहीं, फिर भी वह सन्तुष्ट रहता है। न ही वह किसी निवास-सुविधा की चिन्ता करता है। कभी वह वृक्ष के नीचे रहता है, तो कभी किसी विशाल राजप्रासाद में; वह दोनों में से किसी के प्रति आकृष्ट नहीं होता। उसे स्थिर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अपने संकल्प एवं ज्ञान में स्थिर रहता है। भक्त के गुणों के वर्णन में हमें कुछ पुनरावृत्ति मिल सकती है, किन्तु यह केवल इस तथ्य को दर्शाने के लिए है कि भक्त को ये सभी गुण अर्जित करने ही चाहिए। उत्तम गुणों के बिना कोई शुद्ध भक्त नहीं बन सकता। जो भक्त नहीं है, उसमें कोई उत्तम गुण नहीं होता। जो भक्त के रूप में जाना जाना चाहता है, उसे ये उत्तम गुण विकसित करने चाहिए। निःसन्देह वह इन गुणों को अर्जित करने के लिए बाहरी प्रयत्न नहीं करता, अपितु कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में प्रवृत्ति स्वतः ही उन्हें विकसित करने में उसकी सहायता करती है।