हि

अध्याय 12 · 3 / 16

12.3-4

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥

ये—जो; तु—किन्तु; अक्षरम्—जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है; अनिर्देश्यम्—अनिश्चित; अव्यक्तम्—अव्यक्त; पर्युपासते—पूर्णतः संलग्न रहते हैं; सर्वत्र-गम्—सर्वव्यापी; अचिन्त्यम्—अचिन्त्य; च—भी; कूटस्थम्—केन्द्र में स्थित; अचलम्—अचल; ध्रुवम्—स्थिर; सन्नियम्य—वश में करके; इन्द्रिय-ग्रामम्—समस्त इन्द्रियाँ; सर्वत्र—सर्वत्र; सम-बुद्धयः—समान भाव रखने वाले; ते—वे; प्राप्नुवन्ति—प्राप्त करते हैं; माम्—मुझे; एव—निश्चय ही; सर्व-भूत-हिते—समस्त जीवों के कल्याण में; रताः—संलग्न।

किन्तु जो उस अव्यक्त की पूर्णतः आराधना करते हैं, जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, स्थिर एवं अचल है—अर्थात् परम सत्य की निराकार धारणा की—वे विविध इन्द्रियों को वश में करके तथा सबके प्रति समान भाव रखकर, समस्त प्राणियों के कल्याण में संलग्न ऐसे व्यक्ति, अन्ततः मुझे ही प्राप्त करते हैं।

जो परम भगवान् श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष रूप से आराधना नहीं करते, किन्तु जो किसी परोक्ष विधि से उसी लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, वे भी अन्ततः परम लक्ष्य श्रीकृष्ण को ही प्राप्त करते हैं, जैसा कि कहा गया है, “अनेक जन्मों के पश्चात् ज्ञानी पुरुष मेरी शरण ग्रहण करता है, यह जानकर कि वासुदेव ही सब कुछ हैं।” जब कोई व्यक्ति अनेक जन्मों के पश्चात् पूर्ण ज्ञान को प्राप्त होता है, तब वह भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करता है। यदि कोई इस श्लोक में वर्णित विधि से भगवान् के समीप पहुँचता है, तो उसे इन्द्रियों को वश में करना, सबकी सेवा करना तथा समस्त प्राणियों के कल्याण में संलग्न होना पड़ता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य को भगवान् श्रीकृष्ण के समीप पहुँचना ही पड़ता है, अन्यथा कोई पूर्ण अनुभूति नहीं होती। प्रायः उनकी पूर्ण शरणागति से पूर्व बहुत तपस्या करनी पड़ती है।

व्यष्टि आत्मा के भीतर परमात्मा की अनुभूति करने के लिए मनुष्य को देखने, सुनने, स्वाद लेने, कार्य करने इत्यादि की इन्द्रिय-क्रियाओं को रोकना पड़ता है। तब उसे यह बोध होता है कि परम आत्मा सर्वत्र विद्यमान है। इसकी अनुभूति करके वह किसी जीव से द्वेष नहीं करता—वह मनुष्य एवं पशु में कोई भेद नहीं देखता, क्योंकि वह केवल आत्मा को देखता है, बाह्य आवरण को नहीं। किन्तु सामान्य मनुष्य के लिए निराकार अनुभूति की यह विधि अत्यन्त कठिन है।