हि

अध्याय 12 · 4 / 16

12.5

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥

क्लेशः—कष्ट; अधिकतरः—अधिक कष्टप्रद; तेषाम्—उनके लिए; अव्यक्त—अव्यक्त में; आसक्त—आसक्त; चेतसाम्—जिनके मन ऐसे हैं; अव्यक्ता—अव्यक्त; हि—निश्चय ही; गतिः दुःखम्—प्रगति कष्टप्रद है; देहवद्भिः—देहधारियों के लिए; अवाप्यते—प्राप्त होती है।

जिनके मन परमेश्वर के अव्यक्त, निराकार पक्ष में आसक्त रहते हैं, उनके लिए उन्नति अत्यन्त कष्टप्रद होती है। उस अनुशासन में प्रगति करना देहधारियों के लिए सदैव कठिन रहता है।

दिव्यवादियों का जो वर्ग परमेश्वर के अचिन्त्य, अव्यक्त, निराकार पक्ष के मार्ग का अनुसरण करता है, वे ज्ञानयोगी कहलाते हैं, और जो पूर्ण कृष्णभावनामृत में स्थित होकर भगवान् की भक्ति में संलग्न रहते हैं, वे भक्तियोगी कहलाते हैं। अब यहाँ ज्ञानयोग एवं भक्तियोग के बीच का भेद निश्चित रूप से व्यक्त किया गया है। ज्ञानयोग की विधि, यद्यपि अन्ततः मनुष्य को उसी लक्ष्य तक ले जाती है, अत्यन्त कष्टप्रद है, जबकि भक्तियोग का मार्ग, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की प्रत्यक्ष सेवा में रहने की विधि, देहधारी आत्मा के लिए सुगमतर एवं स्वाभाविक है। व्यष्टि आत्मा अनादि काल से देहधारी है। उसके लिए मात्र सैद्धान्तिक रूप से यह समझना अत्यन्त कठिन है कि वह शरीर नहीं है। अतएव भक्तियोगी श्रीकृष्ण के अर्चाविग्रह को आराध्य रूप में स्वीकार करता है, क्योंकि मन में कोई शारीरिक धारणा स्थिर रहती है, जिसे इस प्रकार लागू किया जा सकता है। निःसन्देह, मन्दिर के भीतर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साकार रूप की आराधना मूर्ति-पूजा नहीं है। वैदिक साहित्य में इस बात का प्रमाण है कि आराधना सगुण एवं निर्गुण हो सकती है—अर्थात् गुणों से युक्त अथवा गुणों से रहित परमेश्वर की। मन्दिर में अर्चाविग्रह की आराधना सगुण आराधना है, क्योंकि भगवान् भौतिक गुणों द्वारा निरूपित किए जाते हैं। किन्तु भगवान् का रूप, यद्यपि पत्थर, काष्ठ अथवा तैलचित्र जैसे भौतिक गुणों द्वारा निरूपित होता है, वस्तुतः भौतिक नहीं है। यही परमेश्वर का परम स्वभाव है।

यहाँ एक स्थूल उदाहरण दिया जा सकता है। हमें मार्ग पर कुछ डाक-पेटियाँ मिल सकती हैं, और यदि हम अपने पत्र उन पेटियों में डालें, तो वे स्वाभाविक रूप से बिना किसी कठिनाई के अपने गन्तव्य तक पहुँच जाएँगे। किन्तु कोई पुरानी पेटी, अथवा कोई नक़ली पेटी, जो हमें कहीं मिल जाए और जो डाकघर द्वारा अधिकृत न हो, यह कार्य नहीं करेगी। इसी प्रकार, ईश्वर का अर्चाविग्रह रूप में एक अधिकृत प्रतिनिधित्व है, जो अर्चाविग्रह कहलाता है। यह अर्चाविग्रह परमेश्वर का अवतार है। ईश्वर उस रूप के माध्यम से सेवा स्वीकार करते हैं। भगवान् सर्वशक्तिमान् एवं सर्वसमर्थ हैं; अतएव अर्चाविग्रह के रूप में अपने अवतार द्वारा वे भक्त की सेवाएँ स्वीकार कर सकते हैं, केवल इसलिए कि बद्ध जीवन में स्थित मनुष्य को सुविधा हो।

इस प्रकार, भक्त के लिए परमेश्वर के समीप तत्क्षण एवं प्रत्यक्ष रूप से पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं है, किन्तु जो आध्यात्मिक अनुभूति हेतु निराकार मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं, उनके लिए यह मार्ग कठिन है। उन्हें उपनिषदों जैसे वैदिक साहित्य के माध्यम से परमेश्वर के अव्यक्त निरूपण को समझना पड़ता है, और उन्हें भाषा सीखनी पड़ती है, अनिन्द्रिय अनुभूतियों को समझना पड़ता है, तथा इन समस्त विधियों की अनुभूति करनी पड़ती है। यह सामान्य मनुष्य के लिए अत्यन्त सुगम नहीं है। कृष्णभावनामृत में स्थित मनुष्य, जो भक्ति में संलग्न है, केवल प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन से, केवल अर्चाविग्रह को विधिपूर्वक प्रणाम अर्पित करके, केवल भगवान् की महिमा का श्रवण करके, तथा केवल भगवान् को अर्पित भोजन के अवशेष ग्रहण करके, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अत्यन्त सुगमता से अनुभूति कर लेता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि निर्विशेषवादी अन्त में परम सत्य की अनुभूति न होने के जोखिम सहित अनावश्यक रूप से एक कष्टप्रद मार्ग ग्रहण कर रहे हैं। किन्तु साकारवादी बिना किसी जोखिम, कष्ट अथवा कठिनाई के पूर्ण पुरुषोत्तम के समीप प्रत्यक्ष रूप से पहुँच जाता है। श्रीमद्भागवत में भी एक समान अंश आता है। वहाँ कहा गया है कि यदि किसी को अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेनी ही है (यह शरणागति की विधि भक्ति कहलाती है), किन्तु इसके स्थान पर वह यह समझने का कष्ट उठाता है कि ब्रह्म क्या है और क्या ब्रह्म नहीं है, और अपना समूचा जीवन उसी रीति से बिता देता है, तो परिणाम मात्र कष्टप्रद ही होता है। अतएव यहाँ यह परामर्श दिया गया है कि मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार का यह कष्टप्रद मार्ग ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि अन्तिम परिणाम में अनिश्चितता रहती है।

जीव नित्य रूप से एक व्यष्टि आत्मा है, और यदि वह आध्यात्मिक पूर्ण में लीन होना चाहता है, तो वह अपने मूल स्वभाव के नित्य एवं ज्ञानमय पक्षों की अनुभूति को प्राप्त कर सकता है, किन्तु आनन्दमय अंश की अनुभूति नहीं होती। किसी भक्त की कृपा से ऐसा दिव्यवादी, जो ज्ञानयोग की विधि में अत्यन्त निपुण है, भक्तियोग, अर्थात् भगवद्भक्ति, के स्तर तक आ सकता है। उस समय निराकारवाद का दीर्घ अभ्यास भी कष्ट का स्रोत बन जाता है, क्योंकि वह उस विचार को त्याग नहीं पाता। अतएव देहधारी आत्मा अव्यक्त के साथ सदा कठिनाई में रहती है, अभ्यास के समय भी और अनुभूति के समय भी। प्रत्येक जीवात्मा आंशिक रूप से स्वतन्त्र है, और मनुष्य को निश्चित रूप से यह जान लेना चाहिए कि यह निराकार अनुभूति उसके आध्यात्मिक आनन्दमय स्वरूप के स्वभाव के विरुद्ध है। मनुष्य को यह विधि ग्रहण नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक व्यष्टि जीव के लिए कृष्णभावनामृत की विधि, जिसमें भक्ति में पूर्ण संलग्नता निहित है, सर्वोत्तम मार्ग है। यदि कोई इस भक्ति की उपेक्षा करना चाहता है, तो नास्तिकता की ओर मुड़ जाने का जोखिम रहता है। इस प्रकार अव्यक्त पर, उस अचिन्त्य पर, जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है, ध्यान केन्द्रित करने की यह विधि, जैसा कि इस श्लोक में पहले ही व्यक्त किया जा चुका है, किसी भी समय, विशेषतः इस युग में, कभी प्रोत्साहित नहीं की जानी चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण इसकी अनुशंसा नहीं करते।