अध्याय 12 · 5 / 16
12.6-7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
ये—जो; तु—किन्तु; सर्वाणि—समस्त; कर्माणि—क्रियाएँ; मयि—मुझमें; सन्न्यस्य—त्याग कर; मत्-पराः—मुझमें आसक्त रहते हुए; अनन्येन—अविभक्त रूप से; एव—निश्चय ही; योगेन—ऐसे भक्तियोग के अभ्यास द्वारा; माम्—मेरा; ध्यायन्तः—ध्यान करते हुए; उपासते—आराधना करते हैं; तेषाम्—उनके; अहम्—मैं; समुद्धर्ता—उद्धारकर्ता; मृत्यु—मृत्यु; संसार—भौतिक अस्तित्व; सागरात्—सागर से; भवामि—बन जाता हूँ; न चिरात्—शीघ्र ही; पार्थ—हे पृथापुत्र; मयि—मुझमें; आवेशित—स्थिर; चेतसाम्—जिनके मन ऐसे हैं उनके।
जो अपनी समस्त क्रियाओं को मुझमें त्याग कर मेरी आराधना करता है और अविचलित रूप से मेरे प्रति समर्पित रहता है, जो भक्ति में संलग्न रहकर सदा मेरा ध्यान करता है और जिसने अपना मन मुझमें स्थिर कर रखा है, हे पृथापुत्र! उसके लिए मैं जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भक्तगण अत्यन्त भाग्यशाली हैं कि भगवान् द्वारा भौतिक अस्तित्व से अति शीघ्र उनका उद्धार किया जाता है। शुद्ध भक्ति में मनुष्य को यह अनुभूति होती है कि ईश्वर महान् हैं और व्यष्टि आत्मा उनके अधीन है। उसका कर्तव्य भगवान् की सेवा करना है—यदि ऐसा नहीं, तो वह माया की सेवा करेगा।
जैसा कि पहले कहा गया है, परमेश्वर को केवल भक्ति द्वारा ही जाना जा सकता है। अतएव मनुष्य को पूर्णतः समर्पित होना चाहिए। श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपना मन पूर्णतः उनमें स्थिर करना चाहिए। मनुष्य को केवल श्रीकृष्ण के लिए कार्य करना चाहिए। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि मनुष्य किस प्रकार के कार्य में संलग्न है, किन्तु वह कार्य केवल श्रीकृष्ण के लिए ही किया जाना चाहिए। यही भक्ति का मानदण्ड है। भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त किसी अन्य उपलब्धि की कामना नहीं करता। उसके जीवन का ध्येय श्रीकृष्ण को प्रसन्न करना है, और वह श्रीकृष्ण की तुष्टि हेतु सब कुछ न्योछावर कर सकता है, ठीक जैसे अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में किया था। यह विधि अत्यन्त सरल है: मनुष्य अपने व्यवसाय में स्वयं को संलग्न कर सकता है और साथ ही हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप कर सकता है। ऐसा दिव्य जप भक्त को भगवान् की ओर आकृष्ट करता है।
परमेश्वर यहाँ प्रतिज्ञा करते हैं कि वे इस प्रकार संलग्न शुद्ध भक्त का बिना विलम्ब के भौतिक अस्तित्व के सागर से उद्धार करेंगे। जो योगाभ्यास में उन्नत हैं, वे योग की विधि से अपनी इच्छानुसार किसी भी लोक में आत्मा को स्थानान्तरित कर सकते हैं, और अन्य लोग विविध रीतियों से अवसर का लाभ उठाते हैं, किन्तु जहाँ तक भक्त का प्रश्न है, यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवान् स्वयं उसे ग्रहण करते हैं। उसे आध्यात्मिक आकाश में स्वयं को स्थानान्तरित करने हेतु अत्यन्त अनुभवी बनने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं रहती।
वराह पुराण में यह श्लोक आता है:
नयामि परमं स्थानमर्चिरादि-गतिं विना
गरुड-स्कन्धमारोप्य यथेच्छमनिवारितः
इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि भक्त को अपनी आत्मा को आध्यात्मिक लोकों में स्थानान्तरित करने हेतु अष्टांगयोग का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। यह उत्तरदायित्व स्वयं परमेश्वर लेते हैं। वे यहाँ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे स्वयं उद्धारकर्ता बन जाते हैं। बालक की पूर्ण देखभाल उसके माता-पिता द्वारा की जाती है, और इस प्रकार उसकी स्थिति सुरक्षित रहती है। इसी प्रकार, भक्त को योगाभ्यास द्वारा स्वयं को अन्य लोकों में स्थानान्तरित करने का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। अपितु परमेश्वर, अपनी महती कृपा से, अपने वाहन गरुड पर सवार होकर तत्क्षण आते हैं, और तत्क्षण ही भक्त का इस भौतिक अस्तित्व से उद्धार कर देते हैं। यद्यपि सागर में गिरा हुआ मनुष्य अत्यन्त संघर्ष कर सकता है और तैरने में अत्यन्त निपुण हो सकता है, फिर भी वह स्वयं को नहीं बचा सकता। किन्तु यदि कोई आकर उसे जल से उठा ले, तो वह सरलता से बच जाता है। इसी प्रकार, भगवान् भक्त को इस भौतिक अस्तित्व से उठा लेते हैं। मनुष्य को केवल कृष्णभावनामृत की सुगम विधि का अभ्यास करना है और स्वयं को पूर्णतः भक्ति में संलग्न करना है। किसी भी बुद्धिमान् मनुष्य को सदा भक्ति की विधि को अन्य सभी मार्गों से अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए। नारायणीय में इसकी पुष्टि इस प्रकार होती है:
या वै साधन-सम्पत्ति-पुरुषार्थ-चतुष्टये
तया विना तदाप्नोति नरो नारायणाश्रयः
इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को सकाम कर्म की विविध विधियों में संलग्न नहीं होना चाहिए, अथवा मानसिक कल्पना की विधि से ज्ञान का अर्जन नहीं करना चाहिए। जो पूर्ण पुरुषोत्तम के प्रति समर्पित है, वह अन्य योगिक विधियों, मानसिक कल्पना, कर्मकाण्ड, यज्ञ, दान इत्यादि से प्राप्त होने वाले समस्त लाभों को प्राप्त कर सकता है। यही भक्ति का विशिष्ट वरदान है।
केवल श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का जप करके—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—भगवान् का भक्त परम गन्तव्य तक सरलता एवं प्रसन्नतापूर्वक पहुँच सकता है, किन्तु इस गन्तव्य तक धर्म की किसी अन्य विधि से नहीं पहुँचा जा सकता।
भगवद्गीता का निष्कर्ष अष्टादश अध्याय में इस प्रकार कहा गया है:
सर्व-धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।
मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार की अन्य समस्त विधियों को त्याग कर केवल कृष्णभावनामृत में भक्ति का सम्पादन करना चाहिए। यही मनुष्य को जीवन की सर्वोच्च पूर्णता तक पहुँचने में समर्थ बनाएगा। मनुष्य को अपने अतीत जीवन के पापमय कर्मों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर उसका पूर्ण भार स्वयं ले लेते हैं। अतएव मनुष्य को आध्यात्मिक अनुभूति में स्वयं का उद्धार करने का व्यर्थ प्रयत्न नहीं करना चाहिए। सब लोग परम सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करें। यही जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है।