अध्याय 12 · 6 / 16
12.8
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥
मयि—मुझमें; एव—निश्चय ही; मनः—मन; आधत्स्व—स्थिर करो; मयि—मुझमें; बुद्धिम्—बुद्धि; निवेशय—लगाओ; निवसिष्यसि—तुम वास करोगे; मयि—मुझमें; एव—निश्चय ही; अतः—अतएव; ऊर्ध्वम्—ऊपर; न—कभी नहीं; संशयः—सन्देह।
अपना मन मुझमें, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में, स्थिर करो और अपनी समस्त बुद्धि मुझमें लगाओ। इस प्रकार तुम सदा मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।
जो भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति में संलग्न है, वह परमेश्वर के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध में वास करता है, अतएव इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसकी स्थिति आरम्भ से ही दिव्य है। भक्त भौतिक धरातल पर वास नहीं करता—वह श्रीकृष्ण में वास करता है। भगवान् का पवित्र नाम एवं भगवान् अभिन्न हैं; अतएव जब भक्त हरे कृष्ण का जप करता है, तब श्रीकृष्ण एवं उनकी अन्तरंगा शक्ति भक्त की जिह्वा पर नृत्य करते हैं। जब वह श्रीकृष्ण को भोजन अर्पित करता है, तब श्रीकृष्ण इन भोज्य पदार्थों को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हैं, और भक्त उन अवशेषों को ग्रहण करके कृष्णमय बन जाता है। जो ऐसी सेवा में संलग्न नहीं है, वह यह नहीं समझ सकता कि ऐसा कैसे होता है, यद्यपि यह एक ऐसी विधि है जिसकी अनुशंसा गीता में तथा अन्य वैदिक साहित्य में की गई है।