हि

अध्याय 13 · 1 / 29

13.1-2

अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ १ ॥
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ २ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; प्रकृतिम्—प्रकृति को; पुरुषम्—भोक्ता को; च—भी; एव—निश्चय ही; क्षेत्रम्—शरीर; क्षेत्रज्ञम्—शरीर के ज्ञाता को; एव—निश्चय ही; च—भी; एतत्—यह सब; वेदितुम्—समझने के लिए; इच्छामि—मैं इच्छा करता हूँ; ज्ञानम्—ज्ञान; ज्ञेयम्—ज्ञेय वस्तु को; च—भी; केशव—हे श्रीकृष्ण; श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; इदम्—यह; शरीरम्—शरीर; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; क्षेत्रम्—क्षेत्र; इति—इस प्रकार; अभिधीयते—कहलाता है; एतत्—यह; यः—जो कोई; वेत्ति—जानता है; तम्—उसे; प्राहुः—कहा जाता है; क्षेत्रज्ञः—शरीर का ज्ञाता; इति—इस प्रकार; तत्-विदः—जो इसे जानता है।

अर्जुन ने कहा : हे मेरे प्रिय श्रीकृष्ण, मैं प्रकृति [प्रकृति] तथा पुरुष [भोक्ता] के विषय में, एवं क्षेत्र तथा क्षेत्र के ज्ञाता के विषय में, और ज्ञान तथा ज्ञान के अन्त के विषय में जानना चाहता हूँ। तब श्रीभगवान् ने कहा : हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर क्षेत्र कहलाता है, और जो इस शरीर को जानता है, वह क्षेत्र का ज्ञाता कहलाता है।

अर्जुन प्रकृति या प्रकृति के विषय में, पुरुष अर्थात् भोक्ता के विषय में, क्षेत्र अर्थात् क्षेत्र के विषय में, क्षेत्रज्ञ अर्थात् उसके ज्ञाता के विषय में, एवं ज्ञान तथा ज्ञान की वस्तु के विषय में जिज्ञासु थे। जब उन्होंने इन सबके विषय में पूछा, तब श्रीकृष्ण ने कहा कि यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और जो इस शरीर को जानता है, वह क्षेत्र का ज्ञाता कहलाता है। यह शरीर बद्धजीव के लिए कर्म का क्षेत्र है। बद्धजीव भौतिक अस्तित्व में फँसा हुआ है, और वह भौतिक प्रकृति पर अधिपत्य जमाने का प्रयास करता है। अतएव भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की अपनी क्षमता के अनुसार उसे कर्म का क्षेत्र प्राप्त होता है। वही कर्म-क्षेत्र शरीर है। और यह शरीर क्या है? शरीर इन्द्रियों से बना है। बद्धजीव इन्द्रियतृप्ति का भोग करना चाहता है, और इन्द्रियतृप्ति भोगने की अपनी क्षमता के अनुसार उसे एक शरीर अर्थात् कर्म-क्षेत्र प्रदान किया जाता है। इसी कारण शरीर को क्षेत्र अर्थात् बद्धजीव के लिए कर्म का क्षेत्र कहा जाता है। अब, जो व्यक्ति अपने को शरीर से तादात्म्य नहीं करता, वह क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्र का ज्ञाता कहलाता है। क्षेत्र तथा उसके ज्ञाता का, अर्थात् शरीर तथा शरीर के ज्ञाता का, भेद समझना अत्यन्त कठिन नहीं है। कोई भी व्यक्ति विचार कर सकता है कि बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक वह शरीर के अनेक परिवर्तनों से गुजरता है, फिर भी वही एक व्यक्ति बना रहता है। इस प्रकार कर्म-क्षेत्र के ज्ञाता तथा वास्तविक कर्म-क्षेत्र में भेद है। इस प्रकार जीवित बद्धजीव यह समझ सकता है कि वह शरीर से भिन्न है। आरम्भ में ही वर्णित है—देहेऽस्मिन्—कि जीव शरीर के भीतर है और यह शरीर बाल्यावस्था से कौमार्य की ओर, कौमार्य से यौवन की ओर तथा यौवन से वृद्धावस्था की ओर परिवर्तित होता रहता है, और जो शरीर का स्वामी है, वह जानता है कि शरीर परिवर्तित हो रहा है। यह स्वामी स्पष्टतः क्षेत्रज्ञ है। कभी-कभी हम समझते हैं कि मैं सुखी हूँ, मैं उन्मत्त हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं कुत्ता हूँ, मैं बिल्ली हूँ : ये ज्ञाता हैं। ज्ञाता क्षेत्र से भिन्न है। यद्यपि हम अनेक वस्तुओं का—अपने वस्त्र आदि का—उपयोग करते हैं, तथापि हम जानते हैं कि हम उन उपयोग की गई वस्तुओं से भिन्न हैं। इसी प्रकार, थोड़े-से चिन्तन से हम यह भी समझ लेते हैं कि हम शरीर से भिन्न हैं।

भगवद्गीता के प्रथम छह अध्यायों में शरीर के ज्ञाता अर्थात् जीव का, तथा उस स्थिति का वर्णन है जिसके द्वारा वह परमेश्वर को समझ सकता है। गीता के मध्यवर्ती छह अध्यायों में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का तथा भक्ति के सन्दर्भ में व्यष्टि आत्मा एवं परमात्मा के बीच के सम्बन्ध का वर्णन है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की श्रेष्ठ स्थिति तथा व्यष्टि आत्मा की अधीनस्थ स्थिति इन अध्यायों में निश्चित रूप से परिभाषित है। जीव समस्त परिस्थितियों में अधीनस्थ हैं, किन्तु अपनी विस्मृति में वे कष्ट भोगते हैं। पुण्यकर्मों से प्रबुद्ध होने पर वे भिन्न-भिन्न रूपों में परमेश्वर की शरण में आते हैं—आर्त के रूप में, धन के अभाव में पड़े लोगों के रूप में, जिज्ञासु के रूप में, तथा ज्ञान की खोज में लगे लोगों के रूप में। इसका भी वर्णन हुआ है। अब, तेरहवें अध्याय से आरम्भ करते हुए यह समझाया गया है कि जीव किस प्रकार भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में आता है, और सकाम कर्म, ज्ञान की साधना तथा भक्ति के सम्पादन की विभिन्न विधियों के माध्यम से परमेश्वर उसका किस प्रकार उद्धार करते हैं। यद्यपि जीव भौतिक शरीर से पूर्णतया भिन्न है, फिर भी वह किसी-न-किसी प्रकार उससे सम्बद्ध हो जाता है। इसका भी वर्णन किया गया है।