अध्याय 13 · 2 / 29
13.3
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ ३ ॥
क्षेत्रज्ञम्—ज्ञाता को; च—भी; अपि—निश्चय ही; माम्—मुझको; विद्धि—जानो; सर्व—समस्त; क्षेत्रेषु—शरीर रूपी क्षेत्रों में; भारत—हे भरतवंशी; क्षेत्र—कर्म का क्षेत्र (शरीर); क्षेत्रज्ञयोः—क्षेत्र का ज्ञाता; ज्ञानम्—ज्ञान; यत्—जो सिखाया जाता है; तत्—वह; ज्ञानम्—ज्ञान; मतम्—मत; मम—मेरा।
हे भरतवंशी, तुम्हें यह समझना चाहिए कि समस्त शरीरों में ज्ञाता मैं भी हूँ, और इस शरीर तथा इसके स्वामी को समझना ही ज्ञान कहलाता है। यही मेरा मत है।
इस शरीर तथा शरीर के स्वामी अर्थात् आत्मा एवं परमात्मा के विषय की चर्चा करते समय हमें अध्ययन के तीन भिन्न-भिन्न विषय मिलेंगे : भगवान्, जीव तथा पदार्थ। प्रत्येक कर्म-क्षेत्र में, प्रत्येक शरीर में, दो आत्माएँ हैं : व्यष्टि आत्मा तथा परमात्मा। चूँकि परमात्मा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण अंश-विस्तार है, इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं, “ज्ञाता मैं भी हूँ, किन्तु मैं शरीर का व्यष्टि स्वामी नहीं हूँ। मैं परम ज्ञाता हूँ। मैं प्रत्येक शरीर में परमात्मा के रूप में उपस्थित हूँ।”
जो व्यक्ति इस भगवद्गीता के अनुसार कर्म-क्षेत्र तथा क्षेत्र के ज्ञाता के विषय का अत्यन्त सूक्ष्म रूप से अध्ययन करता है, वह ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
भगवान् कहते हैं : “प्रत्येक व्यष्टि शरीर में कर्म-क्षेत्र का ज्ञाता मैं हूँ।” व्यष्टि जीव अपने ही शरीर का ज्ञाता हो सकता है, किन्तु उसे अन्य शरीरों का ज्ञान नहीं होता। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो समस्त शरीरों में परमात्मा के रूप में उपस्थित हैं, सभी शरीरों के विषय में सब कुछ जानते हैं। वे जीवन की विभिन्न योनियों के समस्त भिन्न-भिन्न शरीरों को जानते हैं। एक नागरिक अपनी भूमि के टुकड़े के विषय में सब कुछ जान सकता है, किन्तु राजा न केवल अपने राजमहल को अपितु व्यष्टि नागरिकों के अधिकार में आई समस्त सम्पत्तियों को भी जानता है। इसी प्रकार, कोई व्यक्ति व्यष्टि रूप से शरीर का स्वामी हो सकता है, किन्तु परमेश्वर समस्त शरीरों के स्वामी हैं। राजा राज्य का मूल स्वामी है, और नागरिक गौण स्वामी है। इसी प्रकार, परमेश्वर समस्त शरीरों के परम स्वामी हैं।
शरीर इन्द्रियों से बना है। परमेश्वर हृषीकेश हैं, जिसका अर्थ है इन्द्रियों के नियन्ता। वे इन्द्रियों के मूल नियन्ता हैं, जिस प्रकार राजा राज्य की समस्त गतिविधियों का मूल नियन्ता है, और नागरिक गौण नियन्ता हैं। भगवान् यह भी कहते हैं : “ज्ञाता मैं भी हूँ।” इसका अर्थ है कि वे परम ज्ञाता हैं; व्यष्टि आत्मा केवल अपने विशेष शरीर को जानती है। वैदिक साहित्य में इस प्रकार कहा गया है :
kṣetrāṇi hi śarīrāṇi bījaṁ cāpi śubhāśubhe
tāni vetti sa yogātmā tataḥ kṣetrajña ucyate.
यह शरीर क्षेत्र कहलाता है, और इसके भीतर शरीर का स्वामी तथा वे परमेश्वर निवास करते हैं, जो शरीर एवं शरीर के स्वामी, दोनों को जानते हैं। इसी कारण वे समस्त क्षेत्रों के ज्ञाता कहलाते हैं। कर्म-क्षेत्र, कर्मों के स्वामी तथा कर्मों के परम स्वामी के बीच के भेद का वर्णन इस प्रकार किया गया है। शरीर की संरचना, व्यष्टि आत्मा की संरचना तथा परमात्मा की संरचना का पूर्ण ज्ञान वैदिक साहित्य के अनुसार ज्ञानम् कहलाता है। यही श्रीकृष्ण का मत है। आत्मा तथा परमात्मा, दोनों को एक होते हुए भी पृथक् रूप में समझना ही ज्ञान है। जो कर्म-क्षेत्र तथा कर्म के ज्ञाता को नहीं समझता, वह पूर्ण ज्ञान में स्थित नहीं है। मनुष्य को प्रकृति की, पुरुष अर्थात् प्रकृति के भोक्ता की, तथा ईश्वर अर्थात् उस ज्ञाता की स्थिति समझनी होती है, जो प्रकृति एवं व्यष्टि आत्मा पर अधिपत्य रखता या नियन्त्रण करता है। मनुष्य को इन तीनों को उनकी भिन्न-भिन्न क्षमताओं में मिश्रित नहीं करना चाहिए। मनुष्य को चित्रकार, चित्र तथा चित्रफलक को परस्पर भ्रमित नहीं करना चाहिए। यह भौतिक जगत्, जो कर्म-क्षेत्र है, प्रकृति है, और प्रकृति का भोक्ता जीव है, तथा इन दोनों के ऊपर परम नियन्ता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वैदिक भाषा में कहा गया है : “भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रि-विधं ब्रह्म एतत्।” ब्रह्म की तीन धारणाएँ हैं : प्रकृति कर्म-क्षेत्र के रूप में ब्रह्म है, और जीव (व्यष्टि आत्मा) भी ब्रह्म है तथा भौतिक प्रकृति को नियन्त्रित करने का प्रयास करता है, और इन दोनों का नियन्ता भी ब्रह्म है, किन्तु वही तथ्यतः नियन्ता है।
इस अध्याय में यह भी समझाया जाएगा कि दोनों ज्ञाताओं में से एक भ्रमणशील (नश्वर) है और दूसरा अभ्रान्त (अविनाशी) है। एक श्रेष्ठ है और दूसरा अधीनस्थ। जो व्यक्ति क्षेत्र के दोनों ज्ञाताओं को एक ही मानता है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का विरोध करता है, जो यहाँ अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहते हैं कि “कर्म-क्षेत्र का ज्ञाता मैं भी हूँ।” जो रस्सी को सर्प समझ बैठता है, वह ज्ञान में स्थित नहीं है। भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर हैं, और शरीरों के भिन्न-भिन्न स्वामी हैं। चूँकि प्रत्येक व्यष्टि आत्मा में भौतिक प्रकृति पर अधिपत्य जमाने की अपनी व्यष्टि क्षमता होती है, अतः भिन्न-भिन्न शरीर हैं। किन्तु परमेश्वर भी उनमें नियन्ता के रूप में उपस्थित हैं। ‘च’ शब्द सार्थक है, क्योंकि यह शरीरों की समस्त संख्या को इंगित करता है। यही श्रील बलदेव विद्याभूषण का मत है : श्रीकृष्ण व्यष्टि आत्मा के अतिरिक्त प्रत्येक शरीर में परमात्मा के रूप में उपस्थित हैं। और श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि परमात्मा कर्म-क्षेत्र तथा ससीम भोक्ता, दोनों का नियन्ता है।