अध्याय 13 · 10 / 29
13.16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १६ ॥
बहिः—बाहर; अन्तः—भीतर; च—भी; भूतानाम्—समस्त जीवों के; अचरम्—जड़; चरम्—चर; एव—भी; च—तथा; सूक्ष्मत्वात्—सूक्ष्म होने के कारण; तत्—वह; अविज्ञेयम्—अज्ञेय; दूरस्थम्—बहुत दूर; च अन्तिके—समीप भी; च—तथा; तत्—वह।
परम सत्य भीतर तथा बाहर, दोनों में, चर तथा अचर में विद्यमान है। वह भौतिक इन्द्रियों की देखने या जानने की शक्ति से परे है। यद्यपि बहुत-बहुत दूर है, फिर भी वह सबके समीप भी है।
वैदिक साहित्य से हम समझते हैं कि नारायण, परम पुरुष, प्रत्येक जीव के बाहर तथा भीतर, दोनों में निवास कर रहे हैं। वे आध्यात्मिक तथा भौतिक, दोनों संसारों में उपस्थित हैं। यद्यपि वे बहुत-बहुत दूर हैं, फिर भी वे हमारे समीप हैं। ये वैदिक साहित्य के कथन हैं। आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। और, चूँकि वे सदैव दिव्य आनन्द में संलग्न रहते हैं, इसलिए हम नहीं समझ सकते कि वे अपने पूर्ण ऐश्वर्य का किस प्रकार भोग कर रहे हैं। हम इन भौतिक इन्द्रियों से न तो देख सकते हैं और न समझ सकते हैं। अतएव वैदिक भाषा में कहा गया है कि उन्हें समझने के लिए हमारे भौतिक मन तथा इन्द्रियाँ कार्य नहीं कर सकतीं। किन्तु जिसने भक्ति में कृष्णभावनामृत का अभ्यास करके अपने मन तथा इन्द्रियों को शुद्ध कर लिया है, वह उन्हें निरन्तर देख सकता है। ब्रह्म-संहिता में पुष्टि होती है कि जिस भक्त ने परमेश्वर के प्रति प्रेम विकसित कर लिया है, वह उन्हें सदैव, बिना विराम के, देख सकता है। और भगवद्गीता (11.54) में पुष्टि होती है कि वे केवल भक्ति द्वारा ही देखे तथा समझे जा सकते हैं। भक्त्या त्वनन्यया शक्यः।