हि

अध्याय 13 · 11 / 29

13.17

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १७ ॥

अविभक्तम्—विभाजन रहित; च—भी; भूतेषु—प्रत्येक जीव में; विभक्तम्—विभाजित; इव—मानो; च—भी; स्थितम्—स्थित; भूत-भर्तृ—समस्त जीवों का पालनकर्ता; च—भी; तत्—वह; ज्ञेयम्—समझने योग्य; ग्रसिष्णु—निगल जाता है; प्रभविष्णु—विकसित करता है; च—भी।

यद्यपि परमात्मा विभाजित प्रतीत होते हैं, फिर भी वे कभी विभाजित नहीं होते। वे एक रूप में स्थित हैं। यद्यपि वे प्रत्येक जीव के पालनकर्ता हैं, यह समझना चाहिए कि वे सबका भक्षण करते तथा सबको विकसित करते हैं।

भगवान् परमात्मा के रूप में प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं। क्या इसका अर्थ है कि वे विभाजित हो गए हैं? नहीं। वस्तुतः वे एक ही हैं। सूर्य का उदाहरण दिया जाता है : सूर्य मध्याह्न के समय अपने स्थान पर स्थित रहता है। किन्तु यदि कोई समस्त दिशाओं में पाँच हज़ार मील जाकर पूछे, “सूर्य कहाँ है?” तो प्रत्येक व्यक्ति कहेगा कि वह उसके सिर के ऊपर चमक रहा है। वैदिक साहित्य में यह उदाहरण यह दर्शाने के लिए दिया जाता है कि यद्यपि वे अविभाजित हैं, फिर भी वे मानो विभाजित रूप में स्थित हैं। साथ ही वैदिक साहित्य में कहा गया है कि एक ही विष्णु अपनी सर्वशक्तिमत्ता द्वारा सर्वत्र उपस्थित हैं, जिस प्रकार सूर्य अनेक व्यक्तियों को अनेक स्थानों पर प्रकट होता है। और परमेश्वर, यद्यपि प्रत्येक जीव के पालनकर्ता हैं, संहार के समय सब कुछ निगल जाते हैं। इसकी पुष्टि ग्यारहवें अध्याय में हुई थी, जब भगवान् ने कहा कि वे कुरुक्षेत्र में एकत्र समस्त योद्धाओं का भक्षण करने आए हैं। वे यह भी उल्लेख करते हैं कि काल के रूप में भी वे भक्षण करते हैं। वे संहारक हैं, सबके वधकर्ता हैं। जब सृष्टि होती है, तब वे सबको उनकी मूल अवस्था से विकसित करते हैं, और संहार के समय वे उनका भक्षण करते हैं। वैदिक स्तोत्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि वे समस्त जीवों के तथा अन्य सबके उद्गम हैं। सृष्टि के पश्चात् सब कुछ उनकी सर्वशक्तिमत्ता में विश्राम करता है, और संहार के पश्चात् सब कुछ पुनः उनमें विश्राम करने लौट जाता है। ये वैदिक स्तोत्रों की पुष्टियाँ हैं। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म तद् विजिज्ञासस्व। (तैत्तिरीय उपनिषद्, 3.1)