हि

अध्याय 13 · 12 / 29

13.18

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १८ ॥

ज्योतिषाम्—समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में; अपि—भी; तत्—वह; ज्योतिः—प्रकाश का स्रोत; तमसः—अन्धकार से; परम्—परे; उच्यते—कहा जाता है; ज्ञानम्—ज्ञान; ज्ञेयम्—जानने योग्य; ज्ञान-गम्यम्—ज्ञान द्वारा प्राप्य; हृदि—हृदय में; सर्वस्य—प्रत्येक के; विष्ठितम्—स्थित।

वे समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में प्रकाश के स्रोत हैं। वे पदार्थ के अन्धकार से परे हैं तथा अव्यक्त हैं। वे ज्ञान हैं, वे ज्ञान की वस्तु हैं, और वे ज्ञान के लक्ष्य हैं। वे प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं।

परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, सूर्य, चन्द्र, तारे आदि समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में प्रकाश के स्रोत हैं। वैदिक साहित्य में हम पाते हैं कि आध्यात्मिक राज्य में सूर्य या चन्द्र की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि वहाँ परमेश्वर का तेज विद्यमान है। भौतिक जगत् में वह ब्रह्मज्योति, भगवान् का आध्यात्मिक तेज, महत्-तत्त्व अर्थात् भौतिक तत्त्वों से आच्छादित है; अतएव इस भौतिक जगत् में हमें प्रकाश के लिए सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि की सहायता की आवश्यकता होती है। किन्तु आध्यात्मिक जगत् में ऐसी वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं। वैदिक साहित्य में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उनके तेजोमय प्रकाश के कारण सब कुछ प्रकाशित होता है। अतः यह स्पष्ट है कि उनकी स्थिति भौतिक जगत् में नहीं है। वे आध्यात्मिक जगत् में स्थित हैं, जो आध्यात्मिक आकाश में बहुत-बहुत दूर है। इसकी पुष्टि भी वैदिक साहित्य में होती है। आदित्य-वर्णं तमसः परस्तात्। वे ठीक सूर्य के समान नित्य तेजोमय हैं, किन्तु वे इस भौतिक जगत् के अन्धकार से बहुत-बहुत परे हैं। उनका ज्ञान दिव्य है। वैदिक साहित्य पुष्टि करता है कि ब्रह्म संकेन्द्रित दिव्य ज्ञान है। जो उस आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित होने के लिए उत्सुक है, उसे ज्ञान परमेश्वर द्वारा दिया जाता है, जो प्रत्येक के हृदय में स्थित हैं।

एक वैदिक मन्त्र कहता है : तं ह देवम् आत्म-बुद्धि-प्रकाशं मुमुक्षुर् वै शरणम् अहं प्रपद्ये। यदि मनुष्य तनिक भी मुक्ति चाहता है, तो उसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण ग्रहण करनी चाहिए। जहाँ तक परम ज्ञान के लक्ष्य का प्रश्न है, इसकी पुष्टि भी वैदिक साहित्य में होती है : तम् एव विदित्वातिमृत्युम् एति। “केवल आपको जानकर ही मनुष्य जन्म तथा मृत्यु की सीमा का अतिक्रमण कर सकता है।” वे प्रत्येक के हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं। परम के हाथ तथा पैर सर्वत्र वितरित हैं, और यह व्यष्टि आत्मा के विषय में नहीं कहा जा सकता। अतएव यह स्वीकार करना ही चाहिए कि कर्म-क्षेत्र के दो ज्ञाता हैं—व्यष्टि आत्मा तथा परमात्मा। मनुष्य के हाथ-पैर स्थानीय रूप से वितरित हैं, किन्तु श्रीकृष्ण के हाथ-पैर सर्वत्र वितरित हैं। इसकी पुष्टि श्वेताश्वतर उपनिषद् में होती है : सर्वस्य प्रभुम् ईशानं सर्वस्य शरणं बृहत्। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परमात्मा, समस्त जीवों के प्रभु या स्वामी हैं; अतएव वे समस्त जीवों के परम केन्द्र हैं। अतः इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि परम परमात्मा तथा व्यष्टि आत्मा सदैव भिन्न हैं।