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अध्याय 13 · 13 / 29

13.19

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १९ ॥

iti—इस प्रकार; kṣetram—कर्म-क्षेत्र (शरीर); tathā—भी; jñānam—ज्ञान; jñeyam—ज्ञेय; ca—भी; uktam—वर्णित; samāsataḥ—संक्षेप में; mat-bhaktaḥ—मेरा भक्त; etat—यह सब; vijñāya—समझ लेने के पश्चात्; mat-bhāvāya—मेरे स्वभाव को; upapadyate—प्राप्त करता है।

इस प्रकार मैंने कर्म-क्षेत्र (शरीर), ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया है। केवल मेरे भक्तजन ही इसे भली-भाँति समझ सकते हैं और इस प्रकार मेरे स्वभाव को प्राप्त कर सकते हैं।

भगवान् ने शरीर, ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया है। यह ज्ञान तीन वस्तुओं का है—ज्ञाता, ज्ञेय तथा ज्ञान की प्रक्रिया। इन तीनों को मिलाकर विज्ञान, अर्थात् ज्ञान का विज्ञान कहा जाता है। पूर्ण ज्ञान को भगवान् के अनन्य भक्त ही प्रत्यक्ष रूप से समझ सकते हैं। अन्य लोग समझने में असमर्थ रहते हैं। अद्वैतवादी कहते हैं कि अन्तिम अवस्था में ये तीनों वस्तुएँ एक हो जाती हैं, किन्तु भक्तजन इसे स्वीकार नहीं करते। ज्ञान तथा ज्ञान का विकास का अर्थ है—अपने आप को कृष्णभावनामृत में समझना। हम भौतिक चेतना द्वारा संचालित होते हैं, किन्तु ज्यों ही हम समस्त चेतना को श्रीकृष्ण की लीलाओं की ओर अग्रसर करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि श्रीकृष्ण ही सर्वस्व हैं, त्यों ही हमें वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में, ज्ञान भक्ति को भली-भाँति समझने की प्रारम्भिक अवस्था के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।