अध्याय 13 · 14 / 29
13.20
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ २० ॥
prakṛtim—भौतिक प्रकृति को; puruṣam—जीवों को; ca—भी; eva—निश्चय ही; viddhi—जानो; anādī—अनादि; ubhau—दोनों; api—भी; vikārān—विकार; ca—भी; guṇān—प्रकृति के तीन गुण; ca—भी; eva—निश्चय ही; viddhi—जानो; prakṛti—भौतिक प्रकृति से; sambhavān—उत्पन्न।
भौतिक प्रकृति तथा जीवों को अनादि समझना चाहिए। उनके विकार तथा प्रकृति के गुण भौतिक प्रकृति की उपज हैं।
इस ज्ञान के द्वारा शरीर, कर्म-क्षेत्र तथा शरीर के ज्ञाताओं (व्यष्टि आत्मा एवं परमात्मा दोनों) को जाना जा सकता है। शरीर कर्म-क्षेत्र है और भौतिक प्रकृति से बना है। शरीरधारी व्यष्टि आत्मा ही है। शरीर की क्रियाओं का भोग करने वाला पुरुष, अर्थात् जीव है। वह एक ज्ञाता है, और दूसरा परमात्मा है। निःसन्देह यह समझना चाहिए कि परमात्मा तथा व्यष्टि जीव दोनों ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के भिन्न-भिन्न प्राकट्य हैं। जीव उनकी शक्ति की कोटि में आता है, और परमात्मा उनके निजी विस्तार की कोटि में आते हैं।
भौतिक प्रकृति तथा जीव दोनों ही नित्य हैं। अर्थात् वे सृष्टि से पूर्व भी विद्यमान थे। भौतिक प्रकटीकरण परमेश्वर की शक्ति से उद्भूत है, और जीव भी, किन्तु वे उनकी परा शक्ति के हैं। इस ब्रह्माण्ड के प्रकट होने से पूर्व ये दोनों विद्यमान थे। भौतिक प्रकृति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् महाविष्णु में लीन थी, और जब आवश्यकता हुई, तब वह महत्तत्त्व के माध्यम से प्रकट हुई। इसी प्रकार, जीव भी उनमें ही हैं, और बद्ध होने के कारण वे परमेश्वर की सेवा करने के प्रतिकूल हैं। अतः उन्हें आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती। भौतिक प्रकृति के संवरण के पश्चात् इन जीवों को पुनः भौतिक जगत् में कार्य करने तथा आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश हेतु अपने आप को तैयार करने का अवसर दिया जाता है। यही इस भौतिक सृष्टि का रहस्य है। वस्तुतः जीव मूलतः परमेश्वर का आध्यात्मिक अंश है, किन्तु अपने विद्रोही स्वभाव के कारण वह भौतिक प्रकृति के भीतर बद्ध हो जाता है। यह वस्तुतः महत्त्वपूर्ण नहीं कि ये जीव अथवा परमेश्वर के परा जीव भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में किस प्रकार आए। तथापि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जानते हैं कि यह वास्तव में कैसे और क्यों हुआ। शास्त्रों में भगवान् कहते हैं कि जो इस भौतिक प्रकृति से आकृष्ट हैं, वे अस्तित्व हेतु कठोर संघर्ष भोग रहे हैं। किन्तु इन कुछ श्लोकों के वर्णनों से हमें निश्चित रूप से यह जान लेना चाहिए कि तीनों गुणों द्वारा भौतिक प्रकृति के समस्त विकार तथा प्रभाव भी भौतिक प्रकृति की ही उपज हैं। जीवों के सन्दर्भ में समस्त विकार तथा विविधता शरीर के कारण हैं। जहाँ तक आत्मा का प्रश्न है, समस्त जीव एक समान हैं।