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अध्याय 13 · 15 / 29

13.21

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २१ ॥

kārya—कार्य; kāraṇa—कारण; kartṛtve—सृष्टि के विषय में; hetuḥ—साधन; prakṛtiḥ—भौतिक प्रकृति; ucyate—कही जाती है; puruṣaḥ—जीव; sukha—सुख; duḥkhānām—दुःखों का; bhoktṛtve—भोग में; hetuḥ—साधन; ucyate—कहा जाता है।

प्रकृति को समस्त भौतिक कार्यों तथा कारणों का हेतु कहा जाता है, जबकि जीव इस जगत् के विविध सुखों तथा दुःखों का हेतु है।

जीवों में शरीर तथा इन्द्रियों के भिन्न-भिन्न प्राकट्य भौतिक प्रकृति के कारण हैं। चौरासी लाख विभिन्न योनियाँ हैं, और ये विविधताएँ भौतिक प्रकृति की रचना हैं। ये जीव के भिन्न-भिन्न इन्द्रिय-भोगों से उत्पन्न होती हैं, जो इस प्रकार इस अथवा उस शरीर में रहने की इच्छा करता है। जब उसे भिन्न-भिन्न शरीरों में रखा जाता है, तो वह भिन्न-भिन्न प्रकार के सुख तथा दुःख का भोग करता है। उसका भौतिक सुख तथा दुःख उसके शरीर के कारण है, न कि उसके अपने स्वरूप के कारण, जैसा कि वह वास्तव में है। अपनी मूल अवस्था में भोग के विषय में कोई सन्देह नहीं है; अतः वही उसकी वास्तविक अवस्था है। भौतिक प्रकृति पर स्वामित्व जताने की इच्छा के कारण वह भौतिक जगत् में है। आध्यात्मिक जगत् में ऐसी कोई वस्तु नहीं है। आध्यात्मिक जगत् शुद्ध है, किन्तु भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति शरीर को विविध सुख प्रस्तुत करने वाले शिकार प्राप्त करने हेतु कठोर संघर्ष कर रहा है। यह कहना और भी स्पष्ट होगा कि यह शरीर इन्द्रियों का कार्य है। इन्द्रियाँ इच्छा को तृप्त करने के साधन हैं। अब, इन सबका योग—शरीर तथा साधनभूत इन्द्रियाँ—भौतिक प्रकृति द्वारा प्रदान किया जाता है, और, जैसा कि अगले श्लोक में स्पष्ट होगा, जीव अपनी विगत इच्छा तथा कर्म के अनुसार परिस्थितियों से अनुगृहीत अथवा अभिशप्त होता है। मनुष्य की इच्छाओं तथा कर्मों के अनुसार भौतिक प्रकृति उसे विविध निवास-स्थानों में रखती है। ऐसे निवास-स्थानों की प्राप्ति तथा उससे सम्बद्ध भोग अथवा कष्ट का कारण स्वयं जीव ही है। किसी विशेष प्रकार के शरीर में रखे जाने पर वह प्रकृति के नियन्त्रण में आ जाता है, क्योंकि शरीर, पदार्थ होने के कारण, प्रकृति के नियमों के अनुसार कार्य करता है। उस समय जीव में उस नियम को बदलने की शक्ति नहीं होती। मान लीजिए किसी जीव को कुत्ते के शरीर में रखा जाता है। ज्यों ही उसे कुत्ते के शरीर में रखा जाता है, उसे कुत्ते की भाँति कार्य करना ही पड़ता है। वह अन्यथा कार्य नहीं कर सकता। और यदि जीव को सूकर के शरीर में रखा जाए, तो उसे विवश होकर विष्ठा खानी पड़ती है और सूकर की भाँति कार्य करना पड़ता है। इसी प्रकार, यदि जीव को किसी देवता के शरीर में रखा जाए, तो उसे अपने शरीर के अनुसार कार्य करना ही पड़ता है। यही प्रकृति का नियम है। किन्तु समस्त परिस्थितियों में परमात्मा व्यष्टि आत्मा के साथ रहते हैं। इसकी व्याख्या वेदों में इस प्रकार की गई है—dvā suparṇā sayujā sakhāyā। परमेश्वर जीव पर इतने कृपालु हैं कि वे सदा व्यष्टि आत्मा के साथ रहते हैं और समस्त परिस्थितियों में परमात्मा के रूप में उपस्थित रहते हैं।