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अध्याय 13 · 16 / 29

13.22

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २२ ॥

puruṣaḥ—जीव; prakṛti-sthaḥ—भौतिक शक्ति में स्थित होकर; hi—निश्चय ही; bhuṅkte—भोग करता है; prakṛti-jān—भौतिक प्रकृति से उत्पन्न; guṇān—प्रकृति के गुण; kāraṇam—कारण; guṇa-saṅgaḥ—प्रकृति के गुणों के साथ संग; asya—जीव का; sat-asat—भले तथा बुरे; yoni—योनियाँ; janmasu—जन्म।

इस प्रकार भौतिक प्रकृति में स्थित जीव प्रकृति के तीन गुणों का भोग करते हुए जीवन-मार्गों का अनुसरण करता है। यह उसके उस भौतिक प्रकृति के साथ संग के कारण है। इस प्रकार वह विविध योनियों में भले तथा बुरे का सामना करता है।

यह श्लोक यह समझने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि जीव किस प्रकार एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करते हैं। द्वितीय अध्याय में यह समझाया गया है कि जीव एक शरीर से दूसरे शरीर में उसी प्रकार देहान्तरण करता है, जिस प्रकार मनुष्य वस्त्र बदलता है। वस्त्र का यह परिवर्तन भौतिक अस्तित्व के प्रति उसकी आसक्ति के कारण है। जब तक वह इस मिथ्या प्रकटीकरण से मोहित रहता है, तब तक उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तरण करते रहना ही पड़ता है। भौतिक प्रकृति पर स्वामित्व जताने की इच्छा के कारण ही वह ऐसी अवांछनीय परिस्थितियों में पड़ता है। भौतिक इच्छा के प्रभाव में जीव कभी देवता के रूप में, कभी मनुष्य के रूप में, कभी पशु के रूप में, कभी पक्षी के रूप में, कभी कीट के रूप में, कभी जलचर के रूप में, कभी सन्त पुरुष के रूप में, तो कभी खटमल के रूप में जन्म लेता है। यह चलता रहता है। और समस्त परिस्थितियों में जीव अपने आप को अपनी परिस्थितियों का स्वामी मानता है, फिर भी वह भौतिक प्रकृति के प्रभाव में रहता है।

वह किस प्रकार ऐसे भिन्न-भिन्न शरीरों में रखा जाता है, इसकी व्याख्या यहाँ की गई है। यह प्रकृति के भिन्न-भिन्न गुणों के साथ संग के कारण है। अतः मनुष्य को इन तीनों भौतिक गुणों से ऊपर उठकर दिव्य पद पर स्थित होना चाहिए। इसी को कृष्णभावनामृत कहा जाता है। जब तक मनुष्य कृष्णभावनामृत में स्थित नहीं होता, तब तक उसकी भौतिक चेतना उसे एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानान्तरित होने के लिए विवश करती रहेगी, क्योंकि अनादि काल से उसमें भौतिक इच्छाएँ हैं। किन्तु उसे उस धारणा को बदलना ही पड़ता है। वह परिवर्तन केवल प्रामाणिक स्रोतों से श्रवण द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सर्वोत्तम उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है—अर्जुन श्रीकृष्ण से ईश्वर के विज्ञान का श्रवण कर रहे हैं। यदि जीव इस श्रवण-प्रक्रिया के प्रति समर्पित हो जाए, तो वह भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की अपनी चिरसंचित इच्छा को त्याग देगा, और ज्यों-ज्यों वह प्रभुत्व जताने की अपनी दीर्घकालीन इच्छा को क्रमशः एवं समानुपातिक रूप से कम करता है, त्यों-त्यों वह आध्यात्मिक सुख का भोग करने लगता है। एक वैदिक मन्त्र में कहा गया है कि ज्यों-ज्यों वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के संग में विद्वान् होता जाता है, त्यों-त्यों वह समानुपातिक रूप से अपने नित्य आनन्दमय जीवन का आस्वादन करता है।