अध्याय 13 · 17 / 29
13.23
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २३ ॥
upadraṣṭā—अधीक्षक; anumantā—अनुमति देने वाला; ca—भी; bhartā—स्वामी; bhoktā—परम भोक्ता; maheśvaraḥ—परमेश्वर; paramātmā—परमात्मा; iti—भी; ca—और; api uktaḥ—कहा जाता है; dehe—इस शरीर में; asmin—यह; puruṣaḥ—भोक्ता; paraḥ—दिव्य।
फिर भी इस शरीर में एक अन्य, दिव्य भोक्ता है, जो भगवान् हैं, परम स्वामी हैं, जो अधीक्षक तथा अनुमतिदाता के रूप में विद्यमान हैं और जो परमात्मा के रूप में विख्यात हैं।
यहाँ कहा गया है कि परमात्मा, जो सदा व्यष्टि आत्मा के साथ रहते हैं, परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं। वे कोई सामान्य जीव नहीं हैं। चूँकि अद्वैतवादी दार्शनिक शरीर के ज्ञाता को एक मानते हैं, अतः वे सोचते हैं कि परमात्मा तथा व्यष्टि आत्मा में कोई भेद नहीं है। इसे स्पष्ट करने हेतु भगवान् कहते हैं कि वे प्रत्येक शरीर में परमात्मा के प्रतिनिधि हैं। वे व्यष्टि आत्मा से भिन्न हैं; वे परः, अर्थात् दिव्य हैं। व्यष्टि आत्मा किसी विशेष क्षेत्र की क्रियाओं का भोग करती है, किन्तु परमात्मा न तो ससीम भोक्ता के रूप में उपस्थित रहते हैं, न ही शारीरिक क्रियाओं में भाग लेने वाले के रूप में, अपितु साक्षी, अधीक्षक, अनुमतिदाता तथा परम भोक्ता के रूप में उपस्थित रहते हैं। उनका नाम परमात्मा है, आत्मा नहीं, और वे दिव्य हैं। यह स्पष्ट रूप से प्रकट है कि आत्मा तथा परमात्मा भिन्न हैं। परमात्मा के हाथ-पैर सर्वत्र हैं, किन्तु व्यष्टि आत्मा के नहीं। और चूँकि वे परमेश्वर हैं, अतः वे भीतर उपस्थित रहकर व्यष्टि आत्मा की भौतिक भोग की इच्छा का अनुमोदन करते हैं। परम आत्मा की अनुमति के बिना व्यष्टि आत्मा कुछ भी नहीं कर सकती। व्यष्टि आत्मा भक्त अथवा पालित है, और वे भुक्त अथवा पालक हैं। असंख्य जीव हैं, और वे उनमें मित्र के रूप में रह रहे हैं।
तथ्य यह है कि व्यष्टि जीव नित्य रूप से परमेश्वर के अंश हैं, और दोनों मित्रों के समान अत्यन्त घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं। किन्तु जीव में परमेश्वर के अनुमोदन को अस्वीकार करने तथा परम प्रकृति पर प्रभुत्व जताने के प्रयास में स्वतन्त्र रूप से कार्य करने की प्रवृत्ति है, और चूँकि उसमें यह प्रवृत्ति है, अतः उसे परमेश्वर की तटस्था शक्ति कहा जाता है। जीव या तो भौतिक शक्ति में स्थित हो सकता है या आध्यात्मिक शक्ति में। जब तक वह भौतिक शक्ति द्वारा बद्ध रहता है, तब तक परमेश्वर, उसके मित्र परमात्मा के रूप में, केवल उसे आध्यात्मिक शक्ति में लौटाने हेतु उसके साथ रहते हैं। भगवान् सदा उसे आध्यात्मिक शक्ति में वापस ले जाने हेतु उत्सुक रहते हैं, किन्तु अपनी सूक्ष्म स्वतन्त्रता के कारण व्यष्टि जीव निरन्तर आध्यात्मिक प्रकाश के संग को अस्वीकार करता रहता है। स्वतन्त्रता का यह दुरुपयोग ही बद्ध प्रकृति में उसके भौतिक संघर्ष का कारण है। अतः भगवान् सदा भीतर से तथा बाहर से उपदेश देते रहते हैं। बाहर से वे भगवद्गीता में कथित उपदेश देते हैं, और भीतर से वे उसे यह विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि भौतिक क्षेत्र में उसकी क्रियाएँ वास्तविक सुख के अनुकूल नहीं हैं। “इसे त्याग दो और अपनी श्रद्धा मेरी ओर मोड़ दो। तब तुम सुखी होगे,” वे कहते हैं। इस प्रकार जो बुद्धिमान् व्यक्ति परमात्मा अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में अपनी श्रद्धा रखता है, वह ज्ञान के आनन्दमय नित्य जीवन की ओर अग्रसर होने लगता है।