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अध्याय 13 · 18 / 29

13.24

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २४ ॥

yaḥ—जो कोई; evam—इस प्रकार; vetti—समझता है; puruṣam—जीवों को; prakṛtim—भौतिक प्रकृति को; ca—और; guṇaiḥ—भौतिक प्रकृति के गुणों को; saha—सहित; sarvathā—सभी प्रकार से; vartamānaḥ—स्थित; api—होने पर भी; na—कभी नहीं; saḥ—वह; bhūyaḥ—पुनः; abhijāyate—जन्म लेता है।

जो भौतिक प्रकृति, जीव तथा प्रकृति के गुणों की पारस्परिक क्रिया सम्बन्धी इस दर्शन को समझ लेता है, वह निश्चय ही मुक्ति प्राप्त करता है। वह अपनी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, यहाँ पुनः जन्म नहीं लेगा।

भौतिक प्रकृति, परमात्मा, व्यष्टि आत्मा तथा उनके पारस्परिक सम्बन्ध की स्पष्ट समझ मनुष्य को मुक्त होने तथा इस भौतिक प्रकृति में लौटने के लिए विवश हुए बिना आध्यात्मिक वातावरण की ओर अग्रसर होने योग्य बनाती है। यही ज्ञान का फल है। ज्ञान का प्रयोजन यह स्पष्ट रूप से समझना है कि जीव संयोगवश इस भौतिक अस्तित्व में पतित हुआ है। अधिकारियों, सन्त पुरुषों तथा आध्यात्मिक गुरु के संग में अपने व्यक्तिगत प्रयत्न द्वारा उसे अपनी स्थिति को समझना है और तत्पश्चात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा व्याख्यायित भगवद्गीता को यथारूप समझकर आध्यात्मिक चेतना अथवा कृष्णभावनामृत की ओर लौटना है। तब यह निश्चित है कि वह इस भौतिक अस्तित्व में पुनः कभी नहीं आएगा; उसे ज्ञान के आनन्दमय नित्य जीवन हेतु आध्यात्मिक जगत् में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा।