अध्याय 13 · 19 / 29
13.25
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २५ ॥
dhyānena—ध्यान द्वारा; ātmani—आत्मा में; paśyanti—देखते हैं; kecit—कोई; ātmānam—परमात्मा को; ātmanā—मन द्वारा; anye—अन्य; sāṅkhyena—दार्शनिक चर्चा द्वारा; yogena—योग-पद्धति द्वारा; karma-yogena—सकाम इच्छा रहित कर्म द्वारा; ca—भी; apare—अन्य।
उस परमात्मा का अनुभव कुछ लोग ध्यान द्वारा करते हैं, कुछ ज्ञान के अनुशीलन द्वारा, और अन्य सकाम इच्छा रहित कर्म द्वारा करते हैं।
भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि जहाँ तक मनुष्य की आत्म-साक्षात्कार की खोज का प्रश्न है, बद्ध आत्मा को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। जो नास्तिक, अज्ञेयवादी तथा सन्देहवादी हैं, वे आध्यात्मिक बोध की सीमा से परे हैं। किन्तु अन्य ऐसे भी हैं जो आध्यात्मिक जीवन की अपनी समझ में श्रद्धावान् हैं, और उन्हें ऐसे कर्मी कहा जाता है जिन्होंने सकाम फलों का त्याग कर दिया है। जो सदा अद्वैतवाद के सिद्धान्त को स्थापित करने का प्रयास करते हैं, उनकी गणना भी नास्तिकों तथा अज्ञेयवादियों में होती है। दूसरे शब्दों में, केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के भक्तगण ही वास्तव में आध्यात्मिक बोध के योग्य हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि इस भौतिक प्रकृति से परे आध्यात्मिक जगत् है और वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं जो परमात्मा के रूप में विस्तृत हैं, सबमें विद्यमान अन्तर्यामी, सर्वव्यापी भगवान्। निःसन्देह ऐसे भी हैं जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा परम परब्रह्म को समझने का प्रयास करते हैं, और उनकी गणना द्वितीय वर्ग में की जा सकती है। नास्तिक दार्शनिक इस भौतिक जगत् का विश्लेषण चौबीस तत्त्वों में करते हैं, और वे व्यष्टि आत्मा को पच्चीसवें तत्त्व के रूप में रखते हैं। जब वे व्यष्टि आत्मा के स्वभाव को भौतिक तत्त्वों से दिव्य समझने में समर्थ होते हैं, तो वे यह भी समझने में समर्थ होते हैं कि व्यष्टि आत्मा से ऊपर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे छब्बीसवें तत्त्व हैं। इस प्रकार वे भी क्रमशः कृष्णभावनामृत में भक्ति के स्तर तक पहुँच जाते हैं। जो सकाम फलों के बिना कर्म करते हैं, वे भी अपने भाव में पूर्ण हैं। उन्हें कृष्णभावनामृत में भक्ति के स्तर तक उन्नत होने का अवसर दिया जाता है। यहाँ कहा गया है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो चेतना में शुद्ध हैं और जो ध्यान द्वारा परमात्मा का पता लगाने का प्रयास करते हैं, और जब वे अपने भीतर परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं, तो वे दिव्य रूप से स्थित हो जाते हैं। इसी प्रकार, अन्य भी हैं जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा परम आत्मा को समझने का प्रयास करते हैं, और अन्य भी हैं जो हठयोग-पद्धति का अनुशीलन करते हैं और जो बालसुलभ क्रियाओं द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सन्तुष्ट करने का प्रयास करते हैं।