हि

अध्याय 13 · 20 / 29

13.26

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २६ ॥

anye—अन्य; tu—किन्तु; evam—यह; ajānantaḥ—आध्यात्मिक ज्ञान के बिना; śrutvā—श्रवण द्वारा; anyebhyaḥ—अन्यों से; upāsate—आराधना करने लगते हैं; te—वे; api—भी; ca—और; atitaranti—पार कर जाते हैं; eva—निश्चय ही; mṛtyum—मृत्यु के मार्ग को; śruti-parāyaṇāḥ—श्रवण-प्रक्रिया के प्रति प्रवृत्त।

पुनः ऐसे भी हैं जो, यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान में निपुण नहीं हैं, फिर भी अन्यों से उनके विषय में श्रवण करने पर परम पुरुष की आराधना करने लगते हैं। अधिकारियों से श्रवण करने की अपनी प्रवृत्ति के कारण वे भी जन्म-मृत्यु के मार्ग को पार कर जाते हैं।

यह श्लोक विशेष रूप से आधुनिक समाज पर लागू होता है, क्योंकि आधुनिक समाज में आध्यात्मिक विषयों की व्यावहारिक रूप से कोई शिक्षा नहीं है। कुछ लोग नास्तिक अथवा अज्ञेयवादी अथवा दार्शनिक प्रतीत हो सकते हैं, किन्तु वास्तव में उनमें दर्शन का कोई ज्ञान नहीं है। जहाँ तक सामान्य जन का प्रश्न है, यदि वह भली आत्मा है, तो श्रवण द्वारा उन्नति का अवसर है। यह श्रवण-प्रक्रिया अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवान् चैतन्य ने, जिन्होंने आधुनिक जगत् में कृष्णभावनामृत का प्रचार किया, श्रवण पर अत्यधिक बल दिया, क्योंकि यदि सामान्य जन प्रामाणिक स्रोतों से केवल श्रवण ही करे, तो वह प्रगति कर सकता है, विशेषतः, भगवान् चैतन्य के अनुसार, यदि वह दिव्य ध्वनि-कम्पन हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का श्रवण करे। अतः कहा गया है कि समस्त मनुष्यों को साक्षात्कारी आत्माओं से श्रवण का लाभ उठाना चाहिए और क्रमशः सब कुछ समझने योग्य बन जाना चाहिए। तब परमेश्वर की आराधना निःसन्देह सम्पन्न होगी। भगवान् चैतन्य ने कहा है कि इस युग में किसी को अपनी स्थिति बदलने की आवश्यकता नहीं, अपितु मनुष्य को कल्पनात्मक तर्क द्वारा परम सत्य को समझने के प्रयास का त्याग कर देना चाहिए। मनुष्य को उन लोगों का सेवक बनना सीखना चाहिए जो परमेश्वर के ज्ञान में स्थित हैं। यदि मनुष्य इतना सौभाग्यशाली हो कि वह किसी शुद्ध भक्त की शरण ले, उससे आत्म-साक्षात्कार के विषय में श्रवण करे और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करे, तो वह क्रमशः शुद्ध भक्त के पद तक उन्नत हो जाएगा। इस श्लोक में विशेष रूप से श्रवण-प्रक्रिया की दृढ़ता से अनुशंसा की गई है, और यह अत्यन्त उपयुक्त है। यद्यपि सामान्य जन प्रायः तथाकथित दार्शनिकों के समान सक्षम नहीं होता, फिर भी किसी प्रामाणिक व्यक्ति से श्रद्धापूर्वक श्रवण उसे इस भौतिक अस्तित्व को पार करके भगवद्धाम, अपने मूल धाम लौटने में सहायता करेगा।