हि

अध्याय 13 · 21 / 29

13.27

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २७ ॥

yāvat—जो कुछ; saṁjāyate—घटित होता है; kiñcit—कुछ भी; sattvam—अस्तित्व; sthāvara—स्थावर; jaṅgamam—जंगम; kṣetra—शरीर; kṣetrajña—शरीर का ज्ञाता; saṁyogāt—संयोग से; tat viddhi—तुम्हें यह जानना चाहिए; bharatarṣabha—हे भरतश्रेष्ठ।

हे भरतश्रेष्ठ, अस्तित्व में जो कुछ भी तुम देखते हो—स्थावर तथा जंगम दोनों—वह केवल कर्म-क्षेत्र तथा क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र है।

इस श्लोक में भौतिक प्रकृति तथा जीव की व्याख्या की गई है, जो ब्रह्माण्ड की सृष्टि से पूर्व विद्यमान थे। जो कुछ भी सृजित है, वह जीव तथा भौतिक प्रकृति का संयोग मात्र है। वृक्ष, पर्वत तथा पहाड़ियों जैसे अनेक प्राकट्य हैं, जो स्थावर हैं, और अनेक अस्तित्व ऐसे हैं जो जंगम हैं, और ये सभी भौतिक प्रकृति तथा परा प्रकृति, अर्थात् जीव के संयोग मात्र हैं। परा प्रकृति, अर्थात् जीव के स्पर्श के बिना कुछ भी विकसित नहीं हो सकता। अतः पदार्थ तथा प्रकृति के बीच सम्बन्ध नित्य रूप से चलता रहता है, और यह संयोग परमेश्वर द्वारा सम्पन्न किया जाता है; अतः वे परा तथा अपरा दोनों प्रकृतियों के नियन्ता हैं। भौतिक प्रकृति उनके द्वारा सृजित है, और परा प्रकृति इस भौतिक प्रकृति में स्थापित की जाती है, और इस प्रकार ये समस्त क्रियाएँ तथा प्राकट्य घटित होते हैं।