हि

अध्याय 13 · 23 / 29

13.29

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २९ ॥

samam—समान रूप से; paśyan—देखते हुए; hi—निश्चय ही; sarvatra—सर्वत्र; samavasthitam—समान रूप से स्थित; īśvaram—परमात्मा को; na—नहीं; hinasti—पतित करता; ātmanā—मन द्वारा; ātmānam—आत्मा को; tataḥ yāti—तब पहुँचता है; parām—दिव्य; gatim—गन्तव्य को।

जो प्रत्येक जीव में परमात्मा को तथा सर्वत्र समान रूप से देखता है, वह अपने मन द्वारा अपने आप को पतित नहीं करता। इस प्रकार वह दिव्य गन्तव्य की ओर अग्रसर होता है।

जीव, अपने भौतिक अस्तित्व को केवल इतने दुःख के रूप में स्वीकार करके, अपने आध्यात्मिक अस्तित्व में स्थित हो सकता है। यदि मनुष्य यह समझ ले कि परम अपने परमात्मा-प्राकट्य में सर्वत्र स्थित हैं, अर्थात् यदि वह प्रत्येक जीवित वस्तु में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की उपस्थिति को देख सके, तो वह अपने आप को पतित नहीं करता, और अतः वह क्रमशः आध्यात्मिक जगत् में उन्नति करता है। मन सामान्यतया आत्म-केन्द्रित प्रक्रियाओं में आसक्त रहता है; किन्तु जब मन परमात्मा की ओर मुड़ता है, तो मनुष्य आध्यात्मिक बोध में उन्नत हो जाता है।