अध्याय 13 · 24 / 29
13.30
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ ३० ॥
prakṛtyā—भौतिक प्रकृति द्वारा; eva—निश्चय ही; ca—भी; karmāṇi—क्रियाएँ; kriyamāṇāni—सम्पन्न करने में संलग्न; sarvaśaḥ—सभी प्रकार से; yaḥ—जो कोई; paśyati—देखता है; tathā—भी; ātmānam—अपने आप को; akartāram—अकर्ता; saḥ—वह; paśyati—पूर्ण रूप से देखता है।
जो यह देख सकता है कि समस्त क्रियाएँ भौतिक प्रकृति से निर्मित शरीर द्वारा सम्पन्न होती हैं और जो देखता है कि आत्मा कुछ नहीं करती, वही वास्तव में देखता है।
यह शरीर परमात्मा के निर्देशन में भौतिक प्रकृति द्वारा बना है, और किसी के शरीर के सन्दर्भ में जो भी क्रियाएँ चल रही हैं, वे उसका कार्य नहीं हैं। मनुष्य को जो भी करना होता है, चाहे सुख के लिए हो अथवा दुःख के लिए, वह शारीरिक संरचना के कारण करने के लिए विवश होता है। तथापि आत्मा इन समस्त शारीरिक क्रियाओं से बाहर है। यह शरीर मनुष्य की विगत इच्छाओं के अनुसार दिया जाता है। इच्छाओं की पूर्ति हेतु उसे शरीर दिया जाता है, जिससे वह तदनुसार कार्य करता है। व्यावहारिक रूप से कहें तो शरीर एक यन्त्र है, जिसे परमेश्वर ने इच्छाओं की पूर्ति हेतु अभिकल्पित किया है। इच्छाओं के कारण मनुष्य को दुःख भोगने अथवा सुख भोगने हेतु कठिन परिस्थितियों में डाल दिया जाता है। जीव की यह दिव्य दृष्टि, जब विकसित होती है, तो मनुष्य को शारीरिक क्रियाओं से पृथक् कर देती है। जिसके पास ऐसी दृष्टि है, वही वास्तविक द्रष्टा है।