हि

अध्याय 13 · 3 / 29

13.4

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ४ ॥

तत्—वह; क्षेत्रम्—कर्म का क्षेत्र; यत्—जैसा; च—भी; यादृक्—जैसा है; च—भी; यत्—जो है; विकारि—परिवर्तन; यतः—जिससे; च—भी; यत्—जो; सः—वह; च—भी; यः—जो; यत्—जो; प्रभावः च—प्रभाव भी; तत्—वह; समासेन—संक्षेप में; मे—मुझसे; शृणु—सुनो।

अब तुम मुझसे इस कर्म-क्षेत्र का संक्षिप्त वर्णन सुनो—यह किस प्रकार रचित है, इसके परिवर्तन क्या हैं, यह कहाँ से उत्पन्न होता है, कर्म-क्षेत्र का वह ज्ञाता कौन है, और उसके प्रभाव क्या हैं।

भगवान् कर्म-क्षेत्र तथा कर्म-क्षेत्र के ज्ञाता का उनकी स्वाभाविक स्थितियों में वर्णन कर रहे हैं। मनुष्य को यह जानना होता है कि यह शरीर किस प्रकार रचित है, यह शरीर किन पदार्थों से बना है, यह शरीर किसके नियन्त्रण में कार्य कर रहा है, परिवर्तन किस प्रकार हो रहे हैं, परिवर्तन कहाँ से आ रहे हैं, इसके कारण क्या हैं, इसके हेतु क्या हैं, व्यक्ति का परम लक्ष्य क्या है, तथा व्यष्टि आत्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है। मनुष्य को व्यष्टि जीव तथा परमात्मा के बीच का भेद, उनके भिन्न-भिन्न प्रभाव, उनकी सामर्थ्य आदि भी जानने चाहिए। मनुष्य को बस इस भगवद्गीता को साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा दिए गए वर्णन से समझना है, और यह सब स्पष्ट हो जाएगा। किन्तु मनुष्य को सावधान रहना चाहिए कि वह प्रत्येक शरीर तथा व्यष्टि आत्मा में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जीव न मान बैठे। यह तो कुछ-कुछ शक्तिमान् तथा अशक्त को समान कर देने जैसा है।