अध्याय 13 · 26 / 29
13.32
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३२ ॥
anāditvāt—नित्य होने के कारण; nirguṇatvāt—दिव्य होने के कारण; param—भौतिक प्रकृति से परे; ātmā—आत्मा; ayam—यह; avyayaḥ—अक्षय; śarīra-sthaḥ api—यद्यपि शरीर में निवास करते हुए; kaunteya—हे कुन्तीपुत्र; na karoti—कभी कुछ नहीं करता; na lipyate—न ही वह बद्ध होता है।
नित्यता की दृष्टि रखने वाले देख सकते हैं कि आत्मा दिव्य, नित्य तथा प्रकृति के गुणों से परे है। हे अर्जुन, भौतिक शरीर के सम्पर्क में रहने पर भी आत्मा न तो कुछ करती है और न ही बद्ध होती है।
जीव भौतिक शरीर के जन्म के कारण जन्म लेता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में जीव नित्य है; वह जन्म नहीं लेता, और भौतिक शरीर में स्थित होने पर भी वह दिव्य तथा नित्य है। अतः उसका विनाश नहीं हो सकता। स्वभाव से वह आनन्द से परिपूर्ण है। वह अपने आप को किसी भी भौतिक क्रिया में संलग्न नहीं करता; अतः भौतिक शरीरों के साथ उसके सम्पर्क के कारण सम्पन्न होने वाली क्रियाएँ उसे बद्ध नहीं करतीं।