अध्याय 13 · 27 / 29
13.33
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३३ ॥
yathā—जैसे; sarva-gatam—सर्वव्यापी; saukṣmyāt—सूक्ष्म होने के कारण; ākāśam—आकाश; na—कभी नहीं; upalipyate—मिश्रित होता है; sarvatra—सर्वत्र; avasthitaḥ—स्थित; dehe—शरीर में; tathā—उसी प्रकार; ātmā—आत्मा; na—कभी नहीं; upalipyate—मिश्रित होती है।
आकाश, अपने सूक्ष्म स्वभाव के कारण, सर्वव्यापी होने पर भी किसी वस्तु से मिश्रित नहीं होता। इसी प्रकार, ब्रह्म-दृष्टि में स्थित आत्मा, उस शरीर में स्थित होने पर भी, शरीर से मिश्रित नहीं होती।
वायु जल, कीचड़, विष्ठा तथा वहाँ विद्यमान अन्य जो कुछ भी हो, उसमें प्रवेश करती है; फिर भी वह किसी वस्तु से मिश्रित नहीं होती। इसी प्रकार, जीव, विविध प्रकार के शरीरों में स्थित होने पर भी, अपने सूक्ष्म स्वभाव के कारण उनसे पृथक् रहता है। अतः भौतिक नेत्रों से यह देखना असम्भव है कि जीव किस प्रकार इस शरीर के सम्पर्क में है और शरीर के विनाश के पश्चात् वह किस प्रकार उससे बाहर है। विज्ञान में कोई भी इसका निश्चय नहीं कर सकता।