अध्याय 13 · 28 / 29
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यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३४ ॥
yathā—जैसे; prakāśayati—प्रकाशित करता है; ekaḥ—एक; kṛtsnam—सम्पूर्ण; lokam—ब्रह्माण्ड को; imam—इस; raviḥ—सूर्य; kṣetram—यह शरीर; kṣetrī—आत्मा; tathā—उसी प्रकार; kṛtsnam—समस्त; prakāśayati—प्रकाशित करती है; bhārata—हे भरतपुत्र।
हे भरतपुत्र, जैसे एकमात्र सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, वैसे ही शरीर में स्थित एक जीव चेतना द्वारा सम्पूर्ण शरीर को प्रकाशित करता है।
चेतना के विषय में विविध सिद्धान्त हैं। यहाँ भगवद्गीता में सूर्य तथा सूर्यप्रकाश का उदाहरण दिया गया है। जैसे सूर्य एक स्थान पर स्थित रहकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा का एक लघु कण, इस शरीर के हृदय में स्थित होने पर भी, चेतना द्वारा सम्पूर्ण शरीर को प्रकाशित करता है। अतः चेतना आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण है, जैसे सूर्यप्रकाश अथवा प्रकाश सूर्य की उपस्थिति का प्रमाण है।
जब आत्मा शरीर में उपस्थित रहती है, तो सम्पूर्ण शरीर में चेतना रहती है, और ज्यों ही आत्मा शरीर से निकल जाती है, त्यों ही चेतना नहीं रहती। इसे कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति सरलता से समझ सकता है। अतः चेतना पदार्थ के संयोगों की उपज नहीं है। यह जीव का लक्षण है। यद्यपि जीव की चेतना गुणात्मक रूप से परम चेतना के साथ एक है, फिर भी वह परम नहीं है, क्योंकि एक विशेष शरीर की चेतना दूसरे शरीर की चेतना में भागीदार नहीं होती। किन्तु परमात्मा, जो व्यष्टि आत्मा के मित्र के रूप में समस्त शरीरों में स्थित हैं, समस्त शरीरों के प्रति सचेत हैं। यही परम चेतना तथा व्यष्टि चेतना के बीच का भेद है।