अध्याय 13 · 29 / 29
13.35
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३५ ॥
क्षेत्र—शरीर; क्षेत्रज्ञयोः—शरीर के स्वामी का; एवम्—उस; अन्तरम्—अन्तर; ज्ञान-चक्षुषा—ज्ञान के नेत्र से; भूत—जीव; प्रकृति—भौतिक प्रकृति; मोक्षम्—मुक्ति; च—भी; ये—जो; विदुः—जानते हैं; यान्ति—प्राप्त करते हैं; ते—वे; परम्—परम।
जो ज्ञानपूर्वक शरीर तथा शरीर के स्वामी के बीच इस अन्तर को देखता है और इस बन्धन से मुक्ति की विधि को समझ सकता है, वह भी परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
इस तेरहवें अध्याय का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को शरीर, शरीर के स्वामी तथा परमात्मा के बीच के भेद को जानना चाहिए। श्रद्धालु व्यक्ति को सर्वप्रथम भगवान् के विषय में श्रवण करने हेतु कोई उत्तम संगति प्राप्त करनी चाहिए और इस प्रकार क्रमशः प्रबुद्ध हो जाना चाहिए। यदि कोई आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करता है, तो वह पदार्थ तथा आत्मा के बीच भेद करना सीख सकता है, और यही आगे के आध्यात्मिक साक्षात्कार की आधारशिला बन जाता है। आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों को विविध उपदेशों द्वारा जीवन की भौतिक धारणा से मुक्त होना सिखाते हैं। उदाहरणार्थ, भगवद्गीता में हम श्रीकृष्ण को अर्जुन को भौतिकतावादी विचारों से मुक्त करने हेतु उपदेश देते हुए पाते हैं।
मनुष्य यह समझ सकता है कि यह शरीर पदार्थ है; इसका विश्लेषण इसके चौबीस तत्त्वों सहित किया जा सकता है। यह स्थूल प्रकटीकरण है। और सूक्ष्म प्रकटीकरण मन तथा मनोवैज्ञानिक प्रभाव हैं। और जीवन के लक्षण इन विशेषताओं की पारस्परिक क्रिया हैं। किन्तु इन सबके ऊपर आत्मा है, और परमात्मा भी है। आत्मा तथा परमात्मा — ये दो हैं। यह भौतिक जगत् आत्मा तथा चौबीस भौतिक तत्त्वों के संयोग से कार्य कर रहा है। जो समस्त भौतिक प्रकटीकरण की रचना को आत्मा तथा भौतिक तत्त्वों के इस संयोग के रूप में देख सकता है और परमात्मा की स्थिति को भी देख सकता है, वह आध्यात्मिक जगत् में जाने के योग्य बन जाता है। ये विषय चिन्तन तथा साक्षात्कार के लिए हैं, और मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु की सहायता से इस अध्याय का पूर्ण बोध प्राप्त करना चाहिए।
इस प्रकार प्रकृति, भोक्ता तथा चेतना के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय पर भक्तिवेदान्त तात्पर्य समाप्त होते हैं।