अध्याय 14 · 1 / 24
14.1
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । ॥
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥
श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; परम्—दिव्य; भूयः—फिर; प्रवक्ष्यामि—मैं कहूँगा; ज्ञानानाम्—समस्त ज्ञान का; ज्ञानम्—ज्ञान; उत्तमम्—परम; यत्—जिसे; ज्ञात्वा—जानकर; मुनयः—मुनिगण; सर्वे—सभी; पराम्—दिव्य; सिद्धिम्—सिद्धि; इतः—इस संसार से; गताः—प्राप्त की।
श्रीभगवान् ने कहा: मैं तुम्हें पुनः इस परम प्रज्ञा को, समस्त ज्ञानों में सर्वोत्तम ज्ञान को बताऊँगा, जिसे जानकर समस्त मुनिगण परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
सातवें अध्याय से लेकर बारहवें अध्याय के अन्त तक श्रीकृष्ण परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का विस्तारपूर्वक उद्घाटन करते हैं। अब भगवान् स्वयं अर्जुन को और अधिक प्रबुद्ध कर रहे हैं। यदि कोई इस अध्याय को दार्शनिक चिन्तन की प्रक्रिया द्वारा समझ ले, तो वह भक्ति की समझ तक पहुँच जाएगा। तेरहवें अध्याय में यह स्पष्ट रूप से समझाया गया था कि विनम्रतापूर्वक ज्ञान का विकास करके मनुष्य भौतिक बन्धन से सम्भवतः मुक्त हो सकता है। यह भी समझाया गया था कि प्रकृति के गुणों के संसर्ग के कारण ही जीव इस भौतिक जगत् में बँधा रहता है। अब इस अध्याय में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् बताते हैं कि वे प्रकृति के गुण क्या हैं, वे किस प्रकार कार्य करते हैं, किस प्रकार बाँधते हैं और किस प्रकार मुक्ति प्रदान करते हैं। इस अध्याय में समझाए गए ज्ञान को परमेश्वर ने अन्य अध्यायों में अब तक दिए गए ज्ञान से श्रेष्ठ घोषित किया है। इस ज्ञान को समझकर अनेक महान मुनिगण सिद्धि प्राप्त करते हैं और आध्यात्मिक जगत् को चले जाते हैं। अब भगवान् उसी ज्ञान को और उत्तम रीति से समझाते हैं। यह ज्ञान अब तक समझाई गई समस्त ज्ञान-प्रक्रियाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, और इसे जानकर अनेक जन सिद्धि प्राप्त करते हैं। अतः यह अपेक्षित है कि जो इस चौदहवें अध्याय को समझ लेगा, वह सिद्धि प्राप्त करेगा।