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अध्याय 14 · 2 / 24

14.2

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥

इदम्—इस; ज्ञानम्—ज्ञान; उपाश्रित्य—शरण लेकर; मम—मेरे; साधर्म्यम्—स्वभाव को; आगताः—प्राप्त; सर्गे अपि—सृष्टि के समय भी; न—कभी नहीं; उपजायन्ते—जन्म लेते हैं; प्रलये—प्रलय में; न—न ही; व्यथन्ति—विचलित होते हैं; च—भी।

इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य उस दिव्य स्वभाव को प्राप्त कर सकता है, जो मेरे अपने स्वभाव के समान है। इस प्रकार स्थित होकर वह न तो सृष्टि के समय जन्म लेता है और न प्रलय के समय विचलित होता है।

पूर्ण दिव्य ज्ञान अर्जित कर लेने पर मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ गुणात्मक समानता प्राप्त कर लेता है और जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति से मुक्त हो जाता है। तथापि वह व्यष्टि आत्मा के रूप में अपनी पहचान नहीं खोता। वैदिक साहित्य से यह समझा जाता है कि जो मुक्त आत्माएँ आध्यात्मिक आकाश के दिव्य लोकों को प्राप्त हो चुकी हैं, वे सदा परमेश्वर के चरणकमलों की ओर निहारती रहती हैं और उनकी दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहती हैं। अतः मुक्ति के पश्चात् भी भक्तगण अपनी व्यष्टिगत पहचान नहीं खोते।

सामान्यतः भौतिक जगत् में हमें जो भी ज्ञान प्राप्त होता है, वह प्रकृति के तीन गुणों से दूषित होता है। किन्तु जो ज्ञान प्रकृति के तीन गुणों से दूषित नहीं होता, उसे दिव्य ज्ञान कहते हैं। ज्यों ही मनुष्य उस दिव्य ज्ञान में स्थित होता है, वह परम पुरुष के ही समान स्तर पर आ जाता है। जिन्हें आध्यात्मिक आकाश का ज्ञान नहीं, वे मानते हैं कि भौतिक रूप की भौतिक क्रियाओं से मुक्त होने के पश्चात् यह आध्यात्मिक पहचान निराकार, किसी भी विविधता से रहित हो जाती है। किन्तु जिस प्रकार इस जगत् में भौतिक विविधता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत् में भी विविधता विद्यमान है। जो इससे अनभिज्ञ हैं, वे सोचते हैं कि आध्यात्मिक अस्तित्व भौतिक विविधता के विपरीत है। किन्तु वास्तव में आध्यात्मिक आकाश में मनुष्य आध्यात्मिक रूप प्राप्त करता है। वहाँ आध्यात्मिक क्रियाएँ होती हैं, और उस आध्यात्मिक स्थिति को भक्तिमय जीवन कहते हैं। उस वातावरण को निर्मल कहा जाता है, और वहाँ मनुष्य गुण में परमेश्वर के समान होता है। ऐसा ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनुष्य को समस्त आध्यात्मिक गुणों का विकास करना होता है। जो इस प्रकार आध्यात्मिक गुणों का विकास करता है, वह न तो भौतिक जगत् की सृष्टि से और न उसके विनाश से प्रभावित होता है।