अध्याय 14 · 4 / 24
14.4
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
सर्व-योनिषु—समस्त जीव-योनियों में; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; मूर्तयः—रूप; सम्भवन्ति—जैसे प्रकट होते हैं; याः—जो; तासाम्—उन सबका; ब्रह्म—परम; महत् योनिः—भौतिक तत्त्व में जन्म का स्रोत; अहम्—मैं स्वयं; बीज-प्रदः—बीज देने वाला; पिता—पिता।
हे कुन्तीपुत्र, यह समझना चाहिए कि समस्त जीव-योनियाँ इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव होती हैं, और मैं ही बीज देने वाला पिता हूँ।
इस श्लोक में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण समस्त जीवों के आदि पिता हैं। जीव भौतिक प्रकृति और आध्यात्मिक प्रकृति के संयोग हैं। ऐसे जीव केवल इसी ग्रह पर नहीं, अपितु प्रत्येक ग्रह पर दिखाई देते हैं, यहाँ तक कि सर्वोच्च ग्रह पर भी, जहाँ ब्रह्मा स्थित हैं। सर्वत्र जीव विद्यमान हैं; पृथ्वी के भीतर जीव हैं, जल के भीतर और अग्नि के भीतर भी जीव हैं। ये समस्त प्राकट्य माता भौतिक प्रकृति तथा श्रीकृष्ण की बीज-प्रदान प्रक्रिया के कारण हैं। तात्पर्य यह है कि भौतिक जगत् में गर्भित होकर जीव अपने पूर्व कर्मों के अनुसार सृष्टि के समय प्रकट होकर रूप धारण करते हैं।