हि

अध्याय 14 · 5 / 24

14.5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥

सत्त्वम्—सत्त्वगुण; रजः—रजोगुण; तमः—तमोगुण; इति—इस प्रकार; गुणाः—गुण; प्रकृति—भौतिक प्रकृति; सम्भवाः—से उत्पन्न; निबध्नन्ति—बाँधते हैं; महा-बाहो—हे महाबाहु; देहे—इस शरीर में; देहिनम्—जीव को; अव्ययम्—नित्य।

भौतिक प्रकृति तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—से बनी है। जब नित्य जीव प्रकृति के सम्पर्क में आता है, तो वह इन गुणों द्वारा बद्ध हो जाता है।

जीव, चूँकि वह दिव्य है, इस भौतिक प्रकृति से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। फिर भी, चूँकि वह भौतिक जगत् द्वारा बद्ध हो चुका है, अतः वह प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में कर्म करता है। चूँकि जीवों के, प्रकृति के विभिन्न पक्षों के अनुसार, भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीर होते हैं, इसलिए वे उस प्रकृति के अनुसार कर्म करने को प्रेरित होते हैं। यही सुख और दुःख की विविधता का कारण है।