हि

अध्याय 14 · 6 / 24

14.6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६ ॥

तत्र—तत्पश्चात्; सत्त्वम्—सत्त्वगुण; निर्मलत्वात्—भौतिक जगत् में सर्वाधिक शुद्ध होने से; प्रकाशकम्—प्रकाशित करने वाला; अनामयम्—बिना किसी पापमयी प्रतिक्रिया के; सुख—सुख; सङ्गेन—संसर्ग से; बध्नाति—बद्ध करता है; ज्ञान—ज्ञान; सङ्गेन—संसर्ग से; च—भी; अनघ—हे निष्पाप।

हे निष्पाप, सत्त्वगुण, अन्य गुणों से अधिक शुद्ध होने के कारण, प्रकाशमान है और यह मनुष्य को समस्त पापमयी प्रतिक्रियाओं से मुक्त करता है। उस गुण में स्थित जन ज्ञान का विकास करते हैं, किन्तु वे सुख की धारणा द्वारा बद्ध हो जाते हैं।

भौतिक प्रकृति द्वारा बद्ध जीव विविध प्रकार के होते हैं। एक सुखी है, दूसरा अत्यन्त क्रियाशील है, और तीसरा असहाय है। इन समस्त प्रकार के मनोवैज्ञानिक प्राकट्यों से ही जीवों की प्रकृति में बद्ध अवस्था के कारण बनते हैं। वे किस प्रकार भिन्न-भिन्न रूप से बद्ध होते हैं, यह भगवद्गीता के इस अंश में समझाया गया है। सर्वप्रथम सत्त्वगुण पर विचार किया जाता है। भौतिक जगत् में सत्त्वगुण के विकास का प्रभाव यह होता है कि मनुष्य अन्य प्रकार से बद्ध जनों की अपेक्षा अधिक विवेकवान हो जाता है। सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य भौतिक दुःखों से इतना प्रभावित नहीं होता, और उसमें भौतिक ज्ञान में उन्नति का भाव रहता है। इसका प्रतिनिधि प्रकार ब्राह्मण है, जिसके विषय में माना जाता है कि वह सत्त्वगुण में स्थित होता है। सुख का यह भाव इस समझ के कारण होता है कि सत्त्वगुण में मनुष्य न्यूनाधिक रूप से पापमयी प्रतिक्रियाओं से मुक्त होता है। वास्तव में वैदिक साहित्य में कहा गया है कि सत्त्वगुण का अर्थ है अधिक ज्ञान और सुख का अधिक भाव।

यहाँ कठिनाई यह है कि जब जीव सत्त्वगुण में स्थित होता है, तो वह यह अनुभव करने को बद्ध हो जाता है कि वह ज्ञान में उन्नत है और अन्यों से श्रेष्ठ है। इस प्रकार वह बद्ध हो जाता है। इसके सर्वोत्तम उदाहरण वैज्ञानिक और दार्शनिक हैं: प्रत्येक अपने ज्ञान पर अत्यन्त गर्व करता है, और चूँकि वे सामान्यतः अपनी जीवन-दशा को उन्नत करते हैं, अतः वे एक प्रकार के भौतिक सुख का अनुभव करते हैं। बद्ध जीवन में उन्नत सुख का यह भाव उन्हें भौतिक प्रकृति के सत्त्वगुण से बाँध देता है। इसी कारण वे सत्त्वगुण में कर्म करने की ओर आकृष्ट होते हैं, और जब तक उनमें उस प्रकार कर्म करने की आसक्ति रहती है, तब तक उन्हें प्रकृति के गुणों में किसी न किसी प्रकार का शरीर ग्रहण करना पड़ता है। इस प्रकार मोक्ष की, अथवा आध्यात्मिक जगत् को जाने की कोई सम्भावना नहीं रहती। बारम्बार मनुष्य दार्शनिक, वैज्ञानिक अथवा कवि बन सकता है, और बारम्बार जन्म-मृत्यु के उन्हीं अपकारों में बँध जाता है। किन्तु भौतिक ऊर्जा की माया के कारण मनुष्य सोचता है कि वैसा जीवन सुखद है।