हि

अध्याय 14 · 7 / 24

14.7

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७ ॥

रजः—रजोगुण; राग-आत्मकम्—इच्छा अथवा काम से उत्पन्न; विद्धि—जानो; तृष्णा—लालसा; सङ्ग—संसर्ग; समुद्भवम्—से उत्पन्न; तत्—वह; निबध्नाति—बाँधता है; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; कर्म-सङ्गेन—सकाम कर्म के संसर्ग से; देहिनम्—देहधारी को।

हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण असीम इच्छाओं और लालसाओं से उत्पन्न होता है, और इसके कारण मनुष्य भौतिक सकाम कर्मों में बँध जाता है।

रजोगुण का लक्षण पुरुष और स्त्री के बीच के आकर्षण से होता है। स्त्री को पुरुष के प्रति आकर्षण होता है, और पुरुष को स्त्री के प्रति आकर्षण होता है। इसे रजोगुण कहते हैं। और जब रजोगुण बढ़ता है, तो मनुष्य में भौतिक भोग की लालसा विकसित होती है। वह इन्द्रियतृप्ति का भोग करना चाहता है। इन्द्रियतृप्ति के लिए रजोगुण में स्थित मनुष्य समाज में अथवा राष्ट्र में कुछ सम्मान चाहता है, और वह एक सुखी परिवार चाहता है, जिसमें सुन्दर सन्तान, पत्नी और घर हो। ये रजोगुण की उपज हैं। जब तक मनुष्य इन वस्तुओं की लालसा करता है, तब तक उसे अत्यन्त कठोर परिश्रम करना पड़ता है। अतः यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वह अपने कर्मों के फलों से जुड़ जाता है और इस प्रकार ऐसे कर्मों द्वारा बद्ध हो जाता है। अपनी पत्नी, सन्तान और समाज को प्रसन्न करने तथा अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए मनुष्य को कर्म करना पड़ता है। इसी कारण समूचा भौतिक जगत् न्यूनाधिक रूप से रजोगुण में है। आधुनिक सभ्यता रजोगुण के मानकों में उन्नत मानी जाती है। पूर्वकाल में उन्नत दशा सत्त्वगुण में होना मानी जाती थी। यदि सत्त्वगुण में स्थित जनों के लिए मोक्ष नहीं है, तो उनकी क्या कहें जो रजोगुण में बँधे हुए हैं?