हि

अध्याय 17 · 2 / 24

17.2

श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; त्रि-विधा—तीन प्रकार की; भवति—होती है; श्रद्धा—श्रद्धा; देहिनाम्—देहधारियों की; सा—वह; स्व-भाव-जा—उसकी भौतिक प्रकृति के गुण के अनुसार; सात्त्विकी—सतोगुण; राजसी—रजोगुण; च—भी; एव—निश्चय ही; तामसी—तमोगुण; च—और; इति—इस प्रकार; ताम्—उसे; सृणु—मुझसे सुनो।

श्रीभगवान् ने कहा, देहधारी जीव द्वारा अर्जित प्रकृति के गुणों के अनुसार, मनुष्य की श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है—सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी। अब इनके विषय में सुनो।

जो लोग शास्त्रों के विधि-विधानों को जानते हैं, किन्तु आलस्य अथवा प्रमादवश इन विधि-विधानों के पालन को त्याग देते हैं, वे प्रकृति के गुणों द्वारा शासित होते हैं। सतोगुण, रजोगुण अथवा तमोगुण में अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वे एक ऐसी प्रकृति अर्जित करते हैं जो किसी विशिष्ट गुण की होती है। जीव का प्रकृति के विभिन्न गुणों के साथ संसर्ग सनातन रूप से चलता आ रहा है, क्योंकि जीव भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में है। इस प्रकार वह भौतिक गुणों के साथ अपने संसर्ग के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवृत्ति अर्जित करता है। किन्तु यदि कोई प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु का संग करे तथा उनके नियमों और शास्त्रों का पालन करे, तो यह प्रकृति बदली जा सकती है। क्रमशः मनुष्य अपनी स्थिति को तमोगुण से सतोगुण की ओर, अथवा रजोगुण से सतोगुण की ओर बदल सकता है। निष्कर्ष यह है कि प्रकृति के किसी विशेष गुण में अन्धश्रद्धा मनुष्य को सिद्ध अवस्था तक उन्नत होने में सहायता नहीं कर सकती। मनुष्य को प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के संग में बुद्धिपूर्वक, सावधानी से विषयों पर विचार करना होता है। इस प्रकार मनुष्य अपनी स्थिति को प्रकृति के उच्चतर गुण की ओर बदल सकता है।