अध्याय 17 · 8 / 24
17.11
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
अफल-कांक्षिभिः—फल की इच्छा से रहित; यज्ञः—यज्ञ; विधि—तदनुसार; दृष्टः—निर्देश; यः—जो कोई; इज्यते—सम्पन्न करता है; यष्टव्यम्—करना ही चाहिए; एव—निश्चय ही; इति—इस प्रकार; मनः—मन; समाधाय—में स्थिर; सः—वह; सात्त्विकः—सतोगुण में है।
यज्ञों में, जो यज्ञ कर्तव्य एवं शास्त्रीय नियमों के अनुसार तथा फल की किसी अपेक्षा के बिना सम्पन्न किया जाता है, वह सतोगुणी स्वभाव का होता है।
सामान्य प्रवृत्ति यह है कि किसी प्रयोजन को मन में रखकर यज्ञ अर्पित किया जाए, किन्तु यहाँ कहा गया है कि यज्ञ ऐसी किसी इच्छा के बिना सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसे कर्तव्य समझकर किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, मन्दिरों अथवा गिरजाघरों में अनुष्ठानों का सम्पादन लीजिए। सामान्यतः वे भौतिक लाभ के प्रयोजन से सम्पन्न किए जाते हैं, किन्तु वह सतोगुण में नहीं है। मनुष्य को कर्तव्य समझकर मन्दिर अथवा गिरजाघर जाना चाहिए, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आदर अर्पित करना चाहिए तथा पुष्प एवं खाद्य-पदार्थ अर्पित करने चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि केवल ईश्वर की पूजा के लिए मन्दिर जाने का कोई लाभ नहीं है। किन्तु आर्थिक लाभ हेतु पूजा शास्त्रीय आदेश में अनुशंसित नहीं है। मनुष्य को केवल अर्चाविग्रह को आदर अर्पित करने के लिए जाना चाहिए। यह मनुष्य को सतोगुण में स्थित करेगा। प्रत्येक सभ्य मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करे तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आदर अर्पित करे।