हि

अध्याय 17 · 7 / 24

17.8-10

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥

आयुः—आयु की अवधि; सत्त्व—अस्तित्व; बल—बल; आरोग्य—स्वास्थ्य; सुख—सुख; प्रीति—और सन्तोष; विवर्धनाः—बढ़ाने वाले; रस्याः—रसयुक्त; स्निग्धाः—चिकने; स्थिराः—टिकाऊ; हृद्याः—हृदय को प्रिय; आहाराः—भोजन; सात्त्विक—सतोगुणी को; प्रियाः—रुचिकर।

सतोगुणी भोजन आयु की अवधि को बढ़ाते हैं, मनुष्य के अस्तित्व को शुद्ध करते हैं तथा बल, स्वास्थ्य, सुख एवं सन्तोष प्रदान करते हैं। ऐसे पौष्टिक भोजन मधुर, रसयुक्त, चिकने एवं रुचिकर होते हैं। जो भोजन अत्यधिक कटु, अत्यधिक खट्टे, नमकीन, तीखे, रूखे एवं गरम होते हैं, वे रजोगुणी लोगों को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन पीड़ा, क्लेश एवं रोग उत्पन्न करते हैं। जो भोजन खाए जाने से तीन घण्टे से अधिक पूर्व पकाया गया हो, जो स्वादहीन, बासी, सड़ा हुआ, विकृत एवं अपवित्र हो, वह भोजन तमोगुणी लोगों को प्रिय होता है।

भोजन का प्रयोजन आयु की अवधि को बढ़ाना, मन को शुद्ध करना तथा शारीरिक बल में सहायता करना है। यही इसका एकमात्र प्रयोजन है। भूतकाल में महान् अधिकारियों ने उन भोजनों का चयन किया जो स्वास्थ्य में सर्वाधिक सहायक होते हैं और आयु की अवधि को बढ़ाते हैं, जैसे दुग्ध-पदार्थ, शर्करा, चावल, गेहूँ, फल एवं शाक। ये भोजन सतोगुणी व्यक्तियों को अत्यन्त प्रिय हैं। कुछ अन्य भोजन, जैसे भुना हुआ अन्न एवं गुड़, यद्यपि स्वयं में अधिक रुचिकर नहीं होते, किन्तु दूध अथवा अन्य भोजनों के साथ मिलाए जाने पर सुखद बनाए जा सकते हैं। तब वे सतोगुण में होते हैं। ये सभी भोजन स्वभाव से शुद्ध हैं। वे मांस एवं मद्य जैसी अस्पृश्य वस्तुओं से सर्वथा भिन्न हैं। चिकने भोजन, जैसा कि आठवें श्लोक में उल्लिखित है, वध से प्राप्त पशु-चर्बी से कोई सम्बन्ध नहीं रखते। पशु-चर्बी दूध के रूप में उपलब्ध है, जो समस्त भोजनों में सर्वाधिक अद्भुत है। दूध, मक्खन, पनीर एवं इसी प्रकार के पदार्थ पशु-चर्बी को ऐसे रूप में प्रदान करते हैं जो निर्दोष प्राणियों के वध की किसी भी आवश्यकता को समाप्त कर देता है। यह वध केवल पाशविक मनोवृत्ति के कारण ही चलता रहता है। आवश्यक चर्बी प्राप्त करने की सभ्य विधि दूध है। वध अधम मनुष्यों का मार्ग है। प्रोटीन दाल, दलहन, समूचे गेहूँ आदि से पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

रजोगुणी भोजन, जो कटु, अत्यधिक नमकीन, अथवा अत्यधिक गरम अथवा अत्यधिक लाल मिर्च से युक्त होते हैं, आमाशय में श्लेष्मा उत्पन्न करके दुःख का कारण बनते हैं, जिससे रोग होता है। तमोगुणी अथवा अन्धकार के गुण वाले भोजन वस्तुतः वे हैं जो ताज़े नहीं होते। जो भी भोजन खाए जाने से तीन घण्टे से अधिक पूर्व पकाया गया हो (प्रसादम् को छोड़कर, अर्थात् भगवान् को अर्पित भोजन), वह तमोगुण में माना जाता है। क्योंकि वे विकृत हो रहे होते हैं, ऐसे भोजन दुर्गन्ध देते हैं, जो प्रायः इस गुण वाले लोगों को आकृष्ट करती है किन्तु सतोगुणी लोगों को विकर्षित करती है।

भोजन के अवशेष केवल तभी खाए जा सकते हैं जब वे ऐसे भोजन का अंश हों जो पहले परमेश्वर को अर्पित किया गया हो अथवा पहले सन्त-पुरुषों ने, विशेषतः आध्यात्मिक गुरु ने, ग्रहण किया हो। अन्यथा भोजन के अवशेष तमोगुण में माने जाते हैं, और वे संक्रमण अथवा रोग को बढ़ाते हैं। ऐसे खाद्य-पदार्थ, यद्यपि तमोगुणी व्यक्तियों को अत्यन्त रुचिकर होते हैं, सतोगुणी व्यक्तियों द्वारा न तो रुचिकर माने जाते हैं और न ही स्पर्श किए जाते हैं। सर्वोत्तम भोजन वह अवशेष है जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित किया जाता है। भगवद्गीता में परमेश्वर कहते हैं कि वे शाक, आटे एवं दूध के पदार्थों को स्वीकार करते हैं, जब वे भक्ति सहित अर्पित किए जाते हैं। पत्रं पुष्पं फलं तोयम्। निस्सन्देह, भक्ति एवं प्रेम ही प्रमुख वस्तुएँ हैं जिन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वीकार करते हैं। किन्तु यह भी उल्लिखित है कि प्रसादम् किसी विशेष रीति से तैयार किया जाना चाहिए। शास्त्र के आदेश के अनुसार तैयार किया गया कोई भी भोजन जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित किया गया हो, वह दीर्घकाल पूर्व तैयार किया गया हो तो भी ग्रहण किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा भोजन दिव्य है। अतः भोजन को सभी व्यक्तियों के लिए विषाणुरहित, खाद्य एवं रुचिकर बनाने हेतु, मनुष्य को भोजन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अर्पित करना चाहिए।