अध्याय 17 · 9 / 24
17.12
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥
अभिसन्धाय—इच्छा करते हुए; तु—किन्तु; फलम्—फल; दम्भ—गर्व; अर्थम्—भौतिक लाभ; अपि—भी; च—और; एव—निश्चय ही; यत्—जो; इज्यते—पूजा; भरत-श्रेष्ठ—हे भरतश्रेष्ठ; तम्—उस; यज्ञम्—यज्ञ को; विद्धि—जानो; राजसम्—रजोगुण में।
किन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ किसी भौतिक लक्ष्य अथवा लाभ हेतु सम्पन्न किया जाता है, अथवा गर्ववश आडम्बरपूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी स्वभाव का होता है।
कभी-कभी यज्ञ एवं अनुष्ठान स्वर्गलोक तक उन्नति हेतु अथवा इस संसार में किसी भौतिक लाभ हेतु सम्पन्न किए जाते हैं। ऐसे यज्ञ अथवा अनुष्ठान रजोगुण में माने जाते हैं।