अध्याय 17 · 10 / 24
17.13
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
विधि-हीनम्—शास्त्रीय निर्देश के बिना; असृष्ट-अन्नम्—प्रसादम् के वितरण के बिना; मन्त्र-हीनम्—वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के बिना; अदक्षिणम्—पुरोहितों को दक्षिणा के बिना; श्रद्धा—श्रद्धा; विरहितम्—बिना; यज्ञम्—यज्ञ; तामसम्—तमोगुण में; परिचक्षते—माना जाता है।
और जो यज्ञ शास्त्रीय आदेशों की अवहेलना में सम्पन्न किया जाता है, जिसमें कोई आध्यात्मिक भोजन वितरित नहीं किया जाता, कोई मन्त्र उच्चारित नहीं किए जाते और पुरोहितों को कोई दक्षिणा नहीं दी जाती, और जो श्रद्धाहीन है—वह यज्ञ तमोगुणी स्वभाव का होता है।
तमोगुण अथवा अन्धकार के गुण में श्रद्धा वस्तुतः श्रद्धाहीनता है। कभी-कभी लोग केवल धन कमाने के लिए किसी देवता की पूजा करते हैं और फिर शास्त्रीय आदेशों की उपेक्षा करते हुए उस धन को मनोरंजन पर व्यय करते हैं। धार्मिकता के ऐसे आडम्बरपूर्ण प्रदर्शन वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं किए जाते। वे सब तमोगुण में हैं; वे आसुरी मनोवृत्ति उत्पन्न करते हैं और मानव समाज को लाभ नहीं पहुँचाते।