हि

अध्याय 17 · 11 / 24

17.14

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥

देव—परमेश्वर; द्विज—ब्राह्मण; गुरु—आध्यात्मिक गुरु; प्राज्ञ—पूजनीय व्यक्ति; पूजनम्—पूजा; शौचम्—पवित्रता; आर्जवम्—सरलता; ब्रह्म-चर्यम्—ब्रह्मचर्य; अहिंसा—अहिंसा; च—भी; शारीरम्—शरीर से सम्बन्धित; तपः—तप; उच्यते—कहा जाता है।

शरीर का तप इस प्रकार है: परमेश्वर, ब्राह्मणों, आध्यात्मिक गुरु तथा पिता एवं माता जैसे श्रेष्ठजनों की पूजा। पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य एवं अहिंसा भी शरीर के तप हैं।

परमेश्वर यहाँ विभिन्न प्रकार के तप एवं तपस्या की व्याख्या करते हैं। सर्वप्रथम वे शरीर द्वारा अभ्यास किए जाने वाले तप एवं तपस्याओं की व्याख्या करते हैं। मनुष्य को ईश्वर अथवा देवताओं, पूर्ण एवं योग्य ब्राह्मणों तथा आध्यात्मिक गुरु एवं पिता, माता अथवा वैदिक ज्ञान से परिचित किसी भी व्यक्ति जैसे श्रेष्ठजनों को आदर अर्पित करना चाहिए, अथवा आदर अर्पित करना सीखना चाहिए। इन्हें समुचित आदर दिया जाना चाहिए। मनुष्य को अपने को बाह्य एवं आन्तरिक रूप से शुद्ध करने का अभ्यास करना चाहिए, और उसे आचरण में सरल बनना सीखना चाहिए। उसे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो शास्त्रीय आदेश द्वारा अनुमोदित न हो। उसे विवाहित जीवन के बाहर यौन-भोग में लिप्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि शास्त्र में यौन-सम्बन्ध केवल विवाह में ही अनुमोदित है, अन्यथा नहीं। यह ब्रह्मचर्य कहलाता है। जहाँ तक शरीर का सम्बन्ध है, ये तप एवं तपस्याएँ हैं।