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अध्याय 17 · 17 / 24

17.20

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥

दातव्यम्—देने योग्य; इति—इस प्रकार; यत्—जो; दानम्—दान; दीयते—दिया जाता है; अनुपकारिणे—प्रत्युपकार की परवाह किए बिना किसी व्यक्ति को; देशे—स्थान में; काले—समय में; च—भी; पात्रे—उपयुक्त व्यक्ति को; च—और; तत्—वह; दानम्—दान; सात्त्विकम्—सतोगुण में; स्मृतम्—माना जाता है।

जो दान कर्तव्य समझकर, उचित स्थान एवं समय पर, सुपात्र व्यक्ति को, तथा प्रत्युपकार की आशा के बिना दिया जाता है, वह सतोगुणी दान माना जाता है।

वैदिक साहित्य में आध्यात्मिक कार्यों में संलग्न व्यक्ति को दान देने की अनुशंसा की गई है। अविवेकपूर्वक दान देने की कोई अनुशंसा नहीं है। आध्यात्मिक पूर्णता का सदैव विचार रहता है। अतः यह अनुशंसा की जाती है कि दान तीर्थस्थान पर, चन्द्र या सूर्य ग्रहण के समय, अथवा मास के अन्त में, अथवा योग्य ब्राह्मण या वैष्णव (भक्त) को, अथवा मन्दिरों में दिया जाए। ऐसे दान प्रत्युपकार के किसी विचार के बिना दिए जाने चाहिए। निर्धन को दान कभी-कभी करुणावश दिया जाता है, किन्तु यदि कोई निर्धन व्यक्ति दान देने योग्य न हो, तो उससे कोई आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती। दूसरे शब्दों में, अविवेकपूर्ण दान की वैदिक साहित्य में अनुशंसा नहीं की गई है।