हि

अध्याय 17 · 3 / 24

17.3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥

सत्त्व-अनुरूपा—अस्तित्व के अनुसार; सर्वस्य—प्रत्येक का; श्रद्धा—श्रद्धा; भवति—होती है; भारत—हे भरतपुत्र; श्रद्धा—श्रद्धा; मयः—से पूर्ण; अयम्—यह; पुरुषः—जीव; यः—जो कोई; यत्—जिस; श्रद्धः—श्रद्धा; सः—वह; एव—निश्चय ही; सः—वह।

प्रकृति के विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने अस्तित्व के अनुसार, मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है। कहा जाता है कि जीव ने जिन गुणों को अर्जित किया है, उन्हीं के अनुसार वह एक विशेष श्रद्धा वाला होता है।

प्रत्येक मनुष्य की एक विशेष प्रकार की श्रद्धा होती है, चाहे वह कुछ भी हो। किन्तु उसने जो प्रकृति अर्जित की है, उसके अनुसार उसकी श्रद्धा सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी मानी जाती है। इस प्रकार अपनी विशेष प्रकार की श्रद्धा के अनुसार मनुष्य कुछ विशेष व्यक्तियों का संग करता है। अब वास्तविक तथ्य यह है कि प्रत्येक जीव, जैसा कि पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है, मूलतः परमेश्वर का खण्ड अंश है। अतः वह मूलतः प्रकृति के समस्त गुणों से परे दिव्य है। किन्तु जब वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है और बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में आता है, तब वह भौतिक प्रकृति की विभिन्न विविधताओं के संसर्ग से अपनी स्थिति उत्पन्न कर लेता है। इसके फलस्वरूप उत्पन्न कृत्रिम श्रद्धा एवं अस्तित्व केवल भौतिक हैं। यद्यपि मनुष्य किसी संस्कार अथवा जीवन की किसी धारणा से संचालित हो, फिर भी वह मूलतः निर्गुण अर्थात् दिव्य है। अतः मनुष्य को उस भौतिक कल्मष से शुद्ध होना होता है जिसे उसने अर्जित किया है, जिससे वह परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को पुनः प्राप्त कर सके। निर्भय होकर वापस लौटने का एकमात्र पथ यही है—कृष्णभावनामृत। यदि मनुष्य कृष्णभावनामृत में स्थित हो, तो वह पथ उसकी सिद्ध अवस्था तक उन्नति के लिए सुनिश्चित है। यदि मनुष्य आत्म-साक्षात्कार के इस पथ को नहीं अपनाता, तो वह निश्चय ही प्रकृति के गुणों के प्रभाव से संचालित होगा।

इस श्लोक में सत्त्व अर्थात् श्रद्धा शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सत्त्व अथवा श्रद्धा सदैव सत्कर्मों से उत्पन्न होती है। मनुष्य की श्रद्धा किसी देवता में, अथवा किसी रचित ईश्वर में, अथवा किसी मानसिक कल्पना में हो सकती है। यह मानी जाती है कि किसी ऐसी वस्तु में उसकी दृढ़ श्रद्धा है जो भौतिक सत्कर्मों को उत्पन्न करती है। किन्तु भौतिक बद्ध जीवन में भौतिक प्रकृति का कोई भी कर्म पूर्णतः शुद्ध नहीं होता। वे मिश्रित होते हैं। वे शुद्ध सत्त्व में नहीं होते। शुद्ध सत्त्व दिव्य है; शुद्ध सत्त्व में मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है। जब तक मनुष्य की श्रद्धा पूर्णतः शुद्ध सत्त्व में नहीं होती, तब तक वह श्रद्धा प्रकृति के किसी भी गुण से संदूषित होने के अधीन रहती है। प्रकृति के संदूषित गुण हृदय तक विस्तार पाते हैं। अतः प्रकृति के किसी विशेष गुण के सम्पर्क में हृदय की स्थिति के अनुसार, मनुष्य की श्रद्धा स्थापित होती है। यह समझना चाहिए कि यदि मनुष्य का हृदय सतोगुण में है, तो उसकी श्रद्धा भी सतोगुण में होती है। यदि उसका हृदय रजोगुण में है, तो उसकी श्रद्धा भी रजोगुण में होती है। और यदि उसका हृदय तमोगुण अर्थात् भ्रम में है, तो उसकी श्रद्धा भी इसी प्रकार संदूषित होती है। इस प्रकार हम इस संसार में भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रद्धा पाते हैं, और भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रद्धा के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के धर्म होते हैं। धार्मिक श्रद्धा का वास्तविक सिद्धान्त शुद्ध सत्त्व में स्थित है, किन्तु हृदय के कलुषित होने के कारण हम भिन्न-भिन्न प्रकार के धार्मिक सिद्धान्त पाते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न प्रकार की श्रद्धा के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की पूजा होती है।