अध्याय 17 · 18 / 24
17.21
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
यत्—जो; तु—किन्तु; प्रति-उपकार-अर्थम्—किसी प्रत्युपकार की प्राप्ति के लिए; फलम्—फल; उद्दिश्य—इच्छा करते हुए; वा—अथवा; पुनः—फिर; दीयते—दान में दिया जाता है; च—भी; परिक्लिष्टम्—अनिच्छापूर्वक; तत्—वह; दानम्—दान; राजसम्—रजोगुण में; स्मृतम्—समझा जाता है।
किन्तु जो दान किसी प्रत्युपकार की आशा से, अथवा सकाम फल की कामना से, अथवा अनिच्छापूर्ण भाव से किया जाता है, वह रजोगुणी दान कहा जाता है।
दान कभी-कभी स्वर्गलोक में उन्नति के लिए किया जाता है और कभी-कभी बहुत कष्ट के साथ तथा पश्चात्ताप-सहित किया जाता है। “मैंने इस प्रकार इतना अधिक व्यय क्यों किया?” दान कभी-कभी किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के अनुरोध पर, किसी बाध्यता के अधीन भी किया जाता है। इस प्रकार के दान रजोगुण में किए गए कहे जाते हैं।
ऐसी अनेक दानशील संस्थाएँ हैं जो अपने दान उन संस्थानों को अर्पित करती हैं जहाँ इन्द्रियतृप्ति चलती रहती है। ऐसे दानों की वैदिक शास्त्र में अनुशंसा नहीं की गई है। केवल सतोगुणी दान की ही अनुशंसा की गई है।