हि

अध्याय 17 · 19 / 24

17.22

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

अदेश—अपवित्र स्थान; काले—अपवित्र समय; यत्—जो; दानम्—दान; अपात्रेभ्यः—अपात्र व्यक्तियों को; च—भी; दीयते—दिया जाता है; असत्कृतम्—बिना आदर के; अवज्ञातम्—बिना समुचित ध्यान के; तत्—वह; तामसम्—तमोगुण में; उदाहृतम्—कहा जाता है।

और जो दान अनुपयुक्त स्थान एवं समय पर, अपात्र व्यक्तियों को, बिना आदर एवं तिरस्कारपूर्वक किया जाता है, वह तमोगुणी दान है।

यहाँ मादक पदार्थों के सेवन तथा द्यूत में लिप्तता के लिए दिए गए अंशदान को प्रोत्साहित नहीं किया गया है। उस प्रकार का अंशदान तमोगुण में है। ऐसा दान हितकर नहीं होता; अपितु इससे पापी व्यक्ति प्रोत्साहित होते हैं। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति उपयुक्त व्यक्ति को बिना आदर एवं बिना ध्यान के दान दे, तो उस प्रकार का दान भी तमोगुण में कहा जाता है।