अध्याय 17 · 20 / 24
17.23
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
ॐ—परम का संकेत; तत्—वह; सत्—नित्य; इति—वह; निर्देशः—संकेत; ब्राह्मणाः—परम का; त्रि-विधः—तीन प्रकार; स्मृतः—माना जाता है; ब्रह्मणः—ब्राह्मणगण; तेन—अतः; वेदाः—वैदिक साहित्य; च—भी; यज्ञाः—यज्ञ; च—भी; विहिताः—यज्ञ; पुरा—प्राचीन काल में।
सृष्टि के आरम्भ से ही तीन अक्षरों—ॐ तत् सत्—का प्रयोग परम परब्रह्म [ब्रह्म] को इंगित करने के लिए होता आया है। परम के सन्तोष के लिए ब्राह्मणगण वैदिक स्तोत्रों का गायन करते समय तथा यज्ञों के समय इनका उच्चारण करते थे।
यह समझाया जा चुका है कि तपस्या, यज्ञ, दान एवं भोजन तीन कोटियों में विभक्त हैं—सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण। किन्तु प्रथम श्रेणी के हों, द्वितीय श्रेणी के हों या तृतीय श्रेणी के, वे सभी बद्ध हैं तथा प्रकृति के भौतिक गुणों से कलुषित हैं। जब वे परम—ॐ तत् सत्, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, नित्य—को लक्ष्य करके किए जाते हैं, तब वे आध्यात्मिक उन्नति के साधन बन जाते हैं। शास्त्रीय निर्देशों में ऐसा ही उद्देश्य इंगित किया गया है। ये तीनों शब्द—ॐ तत् सत्—विशेष रूप से परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को इंगित करते हैं। वैदिक स्तोत्रों में “ॐ” शब्द सदा पाया जाता है।
जो शास्त्रों के नियमों का पालन किए बिना कर्म करता है, वह परम सत्य को प्राप्त नहीं करेगा। उसे कोई क्षणिक फल मिलेगा, किन्तु जीवन का परम लक्ष्य नहीं। निष्कर्ष यह है कि दान, यज्ञ एवं तपस्या का सम्पादन सतोगुण में ही किया जाना चाहिए। रजोगुण या तमोगुण में किए जाने पर वे निश्चय ही गुणवत्ता में निम्न होते हैं। ये तीन शब्द—ॐ तत् सत्—परमेश्वर के पवित्र नाम के साथ उच्चरित होते हैं, यथा ॐ तद् विष्णोः। जब भी कोई वैदिक स्तोत्र अथवा परमेश्वर का पवित्र नाम उच्चरित होता है, तब “ॐ” जोड़ा जाता है। यही वैदिक साहित्य का संकेत है। ये तीनों शब्द वैदिक स्तोत्रों से लिए गए हैं। ॐ इत्येतद् ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम प्रथम लक्ष्य को इंगित करता है। तत्पश्चात् तत्त्वमसि द्वितीय लक्ष्य को इंगित करता है। और सद् एव सौम्य तृतीय लक्ष्य को इंगित करता है। संयुक्त होकर वे ॐ तत् सत् बन जाते हैं। प्राचीन काल में जब प्रथम सृष्ट जीव ब्रह्मा ने यज्ञ किए, तब उन्होंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के इन तीन नामों का उच्चारण किया। वही सिद्धान्त गुरु-परम्परा द्वारा चलता आया है। अतः इस स्तोत्र का महान् महत्त्व है। इसलिए भगवद्गीता अनुशंसा करती है कि जो भी कर्म किया जाए, वह ॐ तत् सत् के लिए, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लिए किया जाए। जब कोई इन तीन शब्दों के साथ तपस्या, दान एवं यज्ञ करता है, तब वह कृष्णभावनामृत में कर्म कर रहा होता है। कृष्णभावनामृत दिव्य कार्यों का एक वैज्ञानिक सम्पादन है, जो मनुष्य को घर अर्थात् भगवद्धाम लौटने में समर्थ बनाता है। इस प्रकार दिव्य रीति से कर्म करने में ऊर्जा का कोई ह्रास नहीं होता।