हि

अध्याय 17 · 4 / 24

17.4

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥

यजन्ते—पूजा करते हैं; सात्त्विकाः—जो सतोगुण में हैं; देवान्—देवताओं की; यक्ष-रक्षांसि राजसाः—जो रजोगुण में हैं वे असुरों की पूजा करते हैं; प्रेतान्—मृत आत्माओं; भूत-गणान्—भूत-प्रेत; च अन्ये—और अन्य; यजन्ते—पूजा करते हैं; तामसाः—तमोगुण में; जनाः—लोग।

सतोगुणी मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं; रजोगुणी असुरों की पूजा करते हैं; और तमोगुणी भूत-प्रेतों एवं आत्माओं की पूजा करते हैं।

इस श्लोक में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विभिन्न प्रकार के पूजकों का उनके बाह्य कर्मों के अनुसार वर्णन करते हैं। शास्त्रीय आदेश के अनुसार केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही पूजनीय हैं, किन्तु जो लोग शास्त्रीय आदेशों से भली-भाँति परिचित अथवा श्रद्धावान् नहीं हैं, वे भौतिक प्रकृति के गुणों में अपनी विशिष्ट स्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न वस्तुओं की पूजा करते हैं। जो सतोगुण में स्थित हैं, वे सामान्यतः देवताओं की पूजा करते हैं। देवताओं में ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र, चन्द्र एवं सूर्यदेव जैसे अन्य देवता सम्मिलित हैं। विविध देवता हैं। सतोगुणी किसी विशेष प्रयोजन हेतु किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं। इसी प्रकार जो रजोगुण में हैं, वे असुरों की पूजा करते हैं। हमें स्मरण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कलकत्ता में एक व्यक्ति हिटलर की पूजा करता था, क्योंकि उस युद्ध की कृपा से उसने काले बाज़ार में व्यापार करके विशाल धनराशि एकत्र कर ली थी। इसी प्रकार जो रजोगुण एवं तमोगुण में हैं, वे सामान्यतः किसी शक्तिशाली मनुष्य को ईश्वर के रूप में चुन लेते हैं। वे सोचते हैं कि किसी का भी ईश्वर के रूप में पूजन किया जा सकता है और उससे वही परिणाम प्राप्त होंगे।

अब यहाँ स्पष्ट रूप से वर्णित है कि जो रजोगुण में हैं, वे ऐसे ईश्वरों की पूजा करते हैं तथा उनकी रचना करते हैं, और जो तमोगुण अर्थात् अन्धकार में हैं, वे मृत आत्माओं की पूजा करते हैं। कभी-कभी लोग किसी मृत व्यक्ति की समाधि पर पूजा करते हैं। यौन-सेवा भी तमोगुण में मानी जाती है। इसी प्रकार भारत के दूरस्थ गाँवों में भूतों के पूजक हैं। हमने देखा है कि भारत में निम्न वर्ग के लोग कभी-कभी वन में जाते हैं, और यदि उन्हें यह ज्ञात हो कि किसी वृक्ष में कोई भूत निवास करता है, तो वे उस वृक्ष की पूजा करते हैं और बलि अर्पित करते हैं। ये भिन्न-भिन्न प्रकार की पूजाएँ वस्तुतः ईश्वर-पूजा नहीं हैं। ईश्वर-पूजा उन व्यक्तियों के लिए है जो दिव्यतः शुद्ध सत्त्व में स्थित हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है, सत्त्वं विशुद्धं वासुदेव-शब्दितम्। “जब मनुष्य शुद्ध सत्त्व में स्थित होता है, तब वह वासुदेव की पूजा करता है।” तात्पर्य यह है कि जो प्रकृति के भौतिक गुणों से पूर्णतः शुद्ध हो चुके हैं और जो दिव्यतः स्थित हैं, वे ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा कर सकते हैं।

निर्विशेषवादी सतोगुण में स्थित माने जाते हैं, और वे पाँच प्रकार के देवताओं की पूजा करते हैं। वे निराकार विष्णु अथवा भौतिक जगत् में विष्णु-रूप की पूजा करते हैं, जो दार्शनिकीकृत विष्णु के रूप में जाना जाता है। विष्णु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विस्तार हैं, किन्तु निर्विशेषवादी, क्योंकि वे अन्ततः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में विश्वास नहीं करते, यह कल्पना करते हैं कि विष्णु-रूप निराकार ब्रह्म का ही एक अन्य पक्ष है; इसी प्रकार वे यह कल्पना करते हैं कि भगवान् ब्रह्मा रजोगुण में निराकार रूप हैं। अतः वे कभी-कभी पाँच प्रकार के पूजनीय ईश्वरों का वर्णन करते हैं, किन्तु क्योंकि वे यह सोचते हैं कि वास्तविक सत्य निराकार ब्रह्म है, इसलिए वे अन्ततः समस्त पूजनीय वस्तुओं का परित्याग कर देते हैं। निष्कर्ष यह है कि भौतिक प्रकृति के गुणों की विभिन्न विशेषताएँ दिव्य प्रकृति वाले व्यक्तियों के संग से शुद्ध की जा सकती हैं।