हि

अध्याय 17 · 5 / 24

17.5-6

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥

अशास्त्र—शास्त्रों में उल्लिखित नहीं; विहितम्—निर्देशित; घोरम्—दूसरों के लिए हानिकर; तप्यन्ते—तपस्या करते हैं; ये—जो; तपः—तप; जनाः—व्यक्ति; दम्भ—गर्व; अहंकार—अहंकार; संयुक्ताः—संलग्न; काम—वासना; राग—आसक्ति; बल—बल; अन्विताः—से प्रेरित; कर्षयन्तः—कष्ट देते हुए; शरीर-स्थम्—शरीर के भीतर स्थित; भूतग्रामम्—भौतिक तत्त्वों का संयोग; अचेतसः—ऐसी भ्रान्त मनोवृत्ति से; माम्—मुझको; च—भी; एव—निश्चय ही; अन्तः—भीतर; शरीर-स्थम्—शरीर में स्थित; तान्—उन्हें; विद्धि—जानो; आसुर—असुर; निश्चयान्—निश्चय ही।

जो लोग शास्त्रों में अननुशंसित कठोर तप एवं तपस्या करते हैं, उन्हें गर्व, अहंकार, वासना एवं आसक्ति से करते हैं, जो रजोगुण से प्रेरित हैं और जो अपने शारीरिक अंगों के साथ-साथ भीतर निवास करने वाले परमात्मा को भी कष्ट देते हैं, उन्हें असुर समझना चाहिए।

ऐसे व्यक्ति हैं जो तप एवं तपस्या की ऐसी विधियाँ गढ़ लेते हैं जो शास्त्रीय आदेशों में उल्लिखित नहीं हैं। उदाहरणार्थ, किसी गूढ़ प्रयोजन हेतु उपवास करना, जैसे विशुद्ध रूप से किसी राजनीतिक लक्ष्य को बढ़ावा देने के लिए, शास्त्रीय निर्देशों में उल्लिखित नहीं है। शास्त्र आध्यात्मिक उन्नति हेतु उपवास की अनुशंसा करते हैं, किसी राजनीतिक लक्ष्य अथवा सामाजिक प्रयोजन हेतु नहीं। जो व्यक्ति ऐसी तपस्याएँ अपनाते हैं, वे भगवद्गीता के अनुसार निश्चय ही आसुरी हैं। उनके कर्म शास्त्रीय आदेश के विरुद्ध हैं और सामान्य जनता के लिए कल्याणकारी नहीं हैं। वस्तुतः वे गर्व, मिथ्या अहंकार, वासना एवं भौतिक भोग की आसक्ति से कर्म करते हैं। ऐसे कर्मों से न केवल उन भौतिक तत्त्वों के संयोग में, जिनसे शरीर निर्मित है, अपितु शरीर के भीतर निवास करने वाले स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में भी विक्षोभ उत्पन्न होता है। किसी राजनीतिक लक्ष्य हेतु ऐसा अनधिकृत उपवास अथवा तपस्या निश्चय ही दूसरों के लिए अत्यन्त क्षोभकारी है। वे वैदिक साहित्य में उल्लिखित नहीं हैं। कोई आसुरी व्यक्ति यह सोच सकता है कि इस विधि से वह अपने शत्रु अथवा अन्य पक्षों को अपनी इच्छा के अनुरूप विवश कर सकता है, किन्तु कभी-कभी ऐसे उपवास से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। इन कर्मों का पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अनुमोदन नहीं करते, और वे कहते हैं कि जो इनमें संलग्न होते हैं, वे असुर हैं। ऐसे प्रदर्शन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अपमान हैं, क्योंकि वे वैदिक शास्त्रीय आदेशों की अवज्ञा में किए जाते हैं। इस सन्दर्भ में अचेतसः शब्द महत्त्वपूर्ण है—सामान्य मानसिक स्थिति वाले व्यक्तियों को शास्त्रीय आदेशों का पालन करना चाहिए। जो ऐसी स्थिति में नहीं हैं, वे शास्त्रों की उपेक्षा एवं अवज्ञा करते हैं तथा तप एवं तपस्या की अपनी विधि गढ़ लेते हैं। मनुष्य को सदैव आसुरी लोगों के उस अन्तिम परिणाम का स्मरण रखना चाहिए जिसका वर्णन पूर्ववर्ती अध्याय में किया गया है। भगवान् उन्हें आसुरी व्यक्तियों के गर्भ में जन्म लेने हेतु विवश करते हैं। फलस्वरूप वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को जाने बिना जन्म-जन्मान्तर आसुरी सिद्धान्तों के अनुसार जीवन व्यतीत करेंगे। तथापि यदि ऐसे व्यक्ति इतने सौभाग्यशाली हों कि उन्हें कोई आध्यात्मिक गुरु प्राप्त हो जो उन्हें वैदिक प्रज्ञा के पथ की ओर निर्देशित कर सके, तो वे इस बन्धन से मुक्त हो सकते हैं और अन्ततः परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।