हि

अध्याय 17 · 6 / 24

17.7

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥

आहारः—भोजन; तु—निश्चय ही; अपि—भी; सर्वस्य—प्रत्येक का; त्रिविधः—तीन प्रकार का; भवति—होता है; प्रियः—प्रिय; यज्ञः—यज्ञ; तपः—तप; तथा—भी; दानम्—दान; तेषाम्—उनके; भेदम्—भेद; इमम्—इस प्रकार; शृणु—सुनो।

जिस भोजन को सभी ग्रहण करते हैं, वह भी भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यही बात यज्ञ, तप एवं दान पर भी लागू होती है। सुनो, मैं तुम्हें इनके भेद बताऊँगा।

विभिन्न स्थितियों एवं भौतिक प्रकृति के गुणों की दृष्टि से, भोजन करने, यज्ञ, तप एवं दान करने की रीति में भेद होते हैं। ये सब एक ही स्तर पर सम्पन्न नहीं होते। जो लोग विश्लेषणपूर्वक यह समझ सकते हैं कि कौन-से कर्म भौतिक प्रकृति के किस गुण में हैं, वे वस्तुतः बुद्धिमान् हैं; जो सब प्रकार के यज्ञ अथवा भोजन अथवा दान को एक समान मानते हैं, वे विवेक नहीं कर सकते, और वे मूर्ख हैं। ऐसे प्रचारक हैं जो यह प्रतिपादन करते हैं कि मनुष्य जो चाहे वह कर सकता है और सिद्धि प्राप्त कर सकता है। किन्तु ये मूर्ख मार्गदर्शक शास्त्र के निर्देश के अनुसार कार्य नहीं कर रहे। वे विधियाँ गढ़ रहे हैं और सामान्य जनता को भटका रहे हैं।