हि

अध्याय 18 · 2 / 74

18.2

श्रीभगवानुवाच ।
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; काम्यानाम्—कामना सहित; कर्मणाम्—कर्मों का; न्यासम्—त्याग; संन्यासम्—संन्यास-आश्रम; कवयः—विद्वज्जन; विदुः—जानते हैं; सर्व—समस्त; कर्म—कर्मों के; फल—फलों का; त्यागम्—त्याग; प्राहुः—कहते हैं; त्यागम्—त्याग; विचक्षणाः—अनुभवी जन।

श्रीभगवान् ने कहा : समस्त कर्मों के फलों का परित्याग ही विद्वानों द्वारा त्याग [त्याग] कहलाता है। और उसी अवस्था को महान् विद्वज्जन संन्यास-आश्रम [संन्यास] कहते हैं।

फल की कामना से किए जाने वाले कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। यही भगवद्गीता का उपदेश है। किन्तु उन्नत आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ले जाने वाले कर्मों का त्याग नहीं किया जाना चाहिए। इसे अगले श्लोक में स्पष्ट किया जाएगा। वैदिक साहित्य में किसी विशिष्ट प्रयोजन हेतु यज्ञ करने की अनेक विधियाँ निर्धारित हैं। उत्तम पुत्र प्राप्त करने अथवा उच्चतर लोकों में उन्नति प्राप्त करने के लिए कुछ यज्ञ करने योग्य होते हैं, किन्तु कामनाओं से प्रेरित यज्ञ बन्द कर दिए जाने चाहिए। तथापि हृदय की शुद्धि अथवा आध्यात्मिक विज्ञान में उन्नति हेतु किए जाने वाले यज्ञ का त्याग नहीं किया जाना चाहिए।