हि

अध्याय 18 · 12 / 74

18.12

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥

अनिष्टम्—नरक की ओर ले जाने वाला; इष्टम्—स्वर्ग की ओर ले जाने वाला; मिश्रम् च—अथवा मिश्रित; त्रि-विधम्—तीन प्रकार का; कर्मणः—कर्म का; फलम्—फल; भवति—होता है; अत्यागिनाम्—अत्यागियों को; प्रेत्य—मृत्यु के पश्चात्; न तु—किन्तु नहीं; संन्यासिनाम्—संन्यास-आश्रम वालों को; क्वचित्—किसी भी समय।

जो त्यागी नहीं है, उसे मृत्यु के पश्चात् कर्म के त्रिविध फल—इष्ट, अनिष्ट तथा मिश्रित—प्राप्त होते हैं। किन्तु जो संन्यास-आश्रम में स्थित हैं, उन्हें भोगने अथवा कष्ट सहने हेतु ऐसे कोई फल नहीं होते।

कृष्णभावनामृत में अथवा सतोगुण में स्थित व्यक्ति किसी से अथवा किसी ऐसी वस्तु से घृणा नहीं करता जो उसके शरीर को कष्ट देती है। वह उचित स्थान पर तथा उचित समय पर अपने कर्तव्य के कष्टप्रद प्रभावों से भयभीत हुए बिना कर्म करता है। दिव्यता में स्थित ऐसे व्यक्ति को अत्यन्त बुद्धिमान् तथा अपने कर्मों में समस्त सन्देहों से परे समझना चाहिए।